Make your own free website on Tripod.com

Proceedings of one day seminar on

Dr. FATAH SINGH - HIS LIFE AND WORKS

(27th April, 2008)

Home Page

 

Veda interpretation based on vedic glossary - Dr.(Mrs.) Pravesh Saksena

Vedic Symbolism based on vedic glossary - Dr. Abhaya Dev Sharma

Importance of Veda in daily life - Prof. (Mrs.) Yogini Himanshu Vyas

A survey of Vedic Etymology - Dr. Shashi Tiwari

A survey of Vedic monotheism and Omkar - Dr. Aruna Shukla

Vedic Darshan - A direction and thought - Dr. Pratibha Shukla

A survey of Dhai Akshar Ved Ke - Dr. Shashi Prabha Goyal

Vedic view of Arya - Shudra controversy - Dr. Surendra Kumar

Dayanand and his vedic interpretation - Shri Gopal Swami Sarasvati

A survey of Kamayani  -  Smt. Sushma Pal Malhotra

Summary of Proceedings - Dr. Shashi Prabha Goyal

 

 

वैदिक एकेश्वरवाद एवं ओंकार

- डॉ. अरुणा शुक्ला

प्राध्यापिका, संस्कृत विभाग, बी.एल.एम. गर्ल्र्स कालेज, नवाँशहर।

सन् १९८७ में दिल्ली विश्वविद्यालय में वैद्य श्री रामगोपाल जी शास्त्री की स्मृति में आयोजित व्याख्यानमाला के अन्तर्गत डॉ. फतहसिंह ने वैदिक एकेश्वरवाद और ओंकार शीर्षक एक शोध लेख पढ़ा था। बाद में वही लेख वेद-संस्थान, नई दिल्ली के प्रचार मंत्री श्री योगेन्द्र वाधवा जी के सत्प्रयास से पुस्तक रूप में वेदसंस्थान, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ था। उस लेख में वेदों में एकेश्वरवाद का प्रतिपादन ओंकार के रूप में किया गया है। हमारी समस्त दार्शनिक और धार्मिक परंपरा में उसी ओम् को परम तत्त्व ब्रह्म का वाचक माना गया है। विविध देवताओं के चित्रण के मूल में एक ही परम सत्ता को स्वीकार करते हुये कहा गया है कि इन्द्रादि देव वस्तुत: एक ही परं सत् के विविध नाम हैं और इन नामों का नामधा देव एक ही है

यो न: पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।

यो देवानां नामधा एक एव तं संप्रश्नं भुवना यन्त्यन्या॥ (ऋ. १०.८२.३)

उसी एक देव का नाम ओम् है। उसी का वाचक प्रणव है। तैत्तिरीय आरण्यक ने भी ओम् के विभिन्न प्रयोगों को सूत्र रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है

(१)   ओमिति ब्रह्म। ओमितीदं सर्वम्। ओमिति एतदनुकृति ह स्म वा अप्यो श्रावयेति आश्रावयति।

(२)  ओमिति सामानि गायन्ति

(३)  ओं शोमिति शस्त्राणि शँसन्ति

(४)  ओमिति अध्वर्यु: प्रतिगरं प्रतिगृणाति।

(५)  ओमिति ब्रह्मा प्रसौति।

(६)  ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति।

(७)  ओमिति ब्राह्मण: प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति। ब्रह्मैवोपाप्नोति। (तैआ.७.८.१;जैउ.१.८.१)

ऋग्वेद ५.५८.२ में न केवल नाना रूपात्मक जगत के मूल में एक ही तत्त्व स्वीकार किया गया है अपितु यह भी स्पष्ट रूप से माना गया है कि सूर्य आदि प्रतीकों द्वारा वर्णित अनेकता में अनुस्यूत एकता का प्रतिपादन ही वेदों का परम लक्ष्य है

एक एवाग्निर्बहुधा समिद्ध एक: सूर्यो विश्वमनु प्रभूत:।

एकैवोषा सर्वमिदं विभात्येकं वा इदं वि बभूव सर्वम्॥

एकेश्वरवाद के विषय में वेद स्पष्ट घोषणा करता है कि इन्द्र, मित्र आदि नामों से जिन अनेक देवों का उल्लेख मिलता है वह एक ही परम सत् को विविध रूप से व्यक्त करने की वैदिक शैली है

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान्।

एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:॥ (ऋ. १.१६४.४६)

इसी बात को निम्नलिखित मंत्र में पुन: दोहराया गया है कि सुपर्ण एक ही है जिसको विप्र कवि अनेक रूपों में कल्पित करते हैं

सुपर्णं विप्रा: कवयो वचोभिरेकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति। (ऋ. १०.११४.५)

अत: जब ओमितीदं सर्वम् कहा जाता है तो इसका आशय यह होता है कि ओंकार अपने इस रूप में सर्वात्मक है। इसी एकं बहूनाम् को सहस्रशीर्षा, सहस्राक्ष और सहस्रपात् पुरुष के रूप में वर्णित किया गया। अपने पर रूप में वही अपुरुष, अतिपुरुष कहा जाता है। वेदान्त की भाषा में, यह अपुरुष ही निरुपाधिक ब्रह्म कहलाता है। ऋग्वेद की प्रतीकवादी शैली में इसी को सिंधु के पार प्लवनशील अपुरुष दारु कहा गया है

अदो यद् दारु प्लवते सिन्धो: पारे अपूरुषम् (ऋ. १०.१५५.३)।

इसी अपुरुष की अभिव्यक्ति अथवा वाक् मूल वेद है, अपर ओंकार या अपर ब्रह्म है। इसी ब्रह्म वेद को कभी-कभी ब्रह्म का वीर्य भी कहा जाता है, जिसका उद्भरण साधक अपने हिरण्य कोश से करके इष्ट कर्म सम्पन्न करता है

यस्मात् कोशाद् उद्भराम वेदं तस्मिन्नन्तरवदध्म एनम्।

कृतमिष्टं ब्रह्मणो वीर्येण तेन मा देवास्तपसावतेह॥ (अथर्व. १९.७२.१)।

शतपथ ब्राह्मण के अनुसार ओ३म् वस्तुत: प्रणव का सामवेदीय रूप है। अत: कह सकते हैं कि ओ३म् के द्वारा संपूर्ण यज्ञ सामयुक्त हो जाता है

प्रणवेनैव साम्नो रूपमुपगच्छत्यो३म्।

ओ३मित्येतेनो हास्यैष सर्व एव ससामा यज्ञो भवति॥ (मा. श. १.४.१.१)

प्र उपसर्गपूर्वक ङ्ग णु धातु से निष्पन्न प्रणव शब्द किसका अभिधान है, यह विचारणीय है। योगसूत्रकार पतञ्जलि ने तस्य वाचक: प्रणव: इस सूत्र में प्रणव को ईश्वर का वाचक माना है। परवर्ती साहित्य में जहां प्रणव शब्द प्रयुक्त मिलता है वहां सर्वत्र प्रणव का अभिधेय ओम् है। प्रणव से ओम् का ही संकेत ग्रहहोता है जो स्वयं ब्रह्म या परमात्मा का अभिधान है। आश्वलायन संहिता के मानस सूक्त में ओंकार रूप प्रणव को ही पुरुषोत्तम तथा परमात्मा कहा गया है।१ ओंकाररूप प्रणव ही एकाक्षर ब्रह्म है और ओंकार ही प्रणव के नाम से सर्वत्र उल्लिखित है।

गोपथ ब्राह्मण प्रणव के स्वरूप तथा महत्त्व पर विशेष रूप से प्रकाश डालता है। यह बात उल्लेखनीय है कि गोपथ ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण की तरह ओम् को ही प्रणव के रूप में मानता है। किन्तु ऋक्, यजुष्, साम, सूत्र, ब्राह्मण तथा श्लोक की तरह प्रणव की एक अलग सत्ता भी मानी गई है जिसमें ओंकार प्रणव रूप में होता है। गोपथ ब्राह्मण इस जिज्ञासा का समाधान करता है कि ओम् ऋक् है, अथवा यजुष्, है, अथवा साम है, अथवा सूत्र है, अथवा ब्राह्मण है, अथवा श्लोक है ? गोपथ ब्राह्मण के अनुसार ओंकार ऋक् में ऋक् है, यजुष् में यजुष् है, साम में साम है, सूत्र में सूत्र है, ब्राह्मण में ब्राह्मण है तथा श्लोक में श्लोक है। वह जिसके साथ उच्चरित होता है, वह वही होता है। इसी प्रसंग में यह कहा जा सकता है कि ओंकार प्रणव में प्रणव है।२

गोपथ ब्राह्मण इसी ओंकार की आध्यात्मिक उपासना का भी उल्लेख करता है। यह ओंकार अध्यात्म, आत्मभैषज्य तथा आत्मकैवल्य रूप है।कठोपनिषद् में ओम् रूप प्रणव ही ब्रह्म है, उसी की प्राप्ति में वेदाध्ययन, तपस्या, ब्रह्मचर्य आदि सभी साधन हैं।४

ओम् रूप प्रणव का उच्चारण किसी भी मंत्र के प्रारम्भ में किया जाता है। इस विषय में गोपथ ब्राह्मण एक आख्यान देता है जो इस प्रकार हैवसुधाराओं का ऐन्द्र नामक नगर था। उसको असुरों ने चारों तरफ से घेर लिया। उसमें रहने वाले देवता भयभीत हो गये और विचार करने लगे कि इन असुरों को कौन पराभूत करेगा। उन्होंने ब्रह्मा के ज्येष्ठ पुत्र ओंकार को देखा और उनसे कहा कि आपको आगे करके हम असुरों को जीतें। उस ओंकार ने कहाइससे मुझे क्या लाभ होगा ? तब देवताओं ने कहावर मांगो ? उसने वर मांगा कि मेरा उच्चारण किये बिना कोई भी ब्राह्मण मंत्र का उच्चारण न करे। यदि बिना ओंकार का उच्चारण किये मन्त्र का उच्चारण करता है तो वह मन्त्र अमन्त्र हो जायेगा। देवताओं ने तथाऽस्तु कहकर उसे यह वरदान दे दिया। वे देवता देवयजन भूमि के उत्तरार्ध में असुरों के साथ युद्ध करने के लिये तैयार हो गये। ओंकार की सहायता से देवताओं ने ग्नीध्रीय स्थान से असुरों को परास्त कर दिया। चूँकि ओंकार की सहायता से उन्होंने असुरों को पराभूत किया था, इसलिये प्रत्येक वेदमंत्र के उच्चारण से पूर्व ओंकार का उच्चारण किया जाता है।५ जो व्यक्ति इस ओंकार को नहीं जानता वह पराधीन होता है तथा जो उसको इस रूप में जानता है वह मन्त्र को वश में करने वाला होता है।६

 इस आख्यान के पीछे जो भी आध्यात्मिक तथा आधिदैविक रहस्य हो, इतना तो निश्चित है कि किसी भी वेदमन्त्र के उच्चारण से पूर्व ओम् के उच्चारण का स्पष्ट उल्लेख यहाँ गोपथ ब्राह्मण करता है।

देवो भूत्वा देवं यजेत अर्थात् स्वयं देव बनकर देव का यजन करना चाहिये। इस सिद्धान्त के आधार पर यज्ञ में स्वीकृति के लिये ओम् पद का ही प्रयोग किया जाता है, क्योंकि यज्ञ एक दिव्यश्रेष्ठ कर्म है। शतपथ ब्राह्मण भी कहता है कि ओम् ही सत्य है, इसी को देवता जानते हैं, इसलिये अध्वर्यु को यज्ञ में सर्वत्र ओम् द्वारा ही प्रतिगर करना चाहिये।७ ऐतरेय ब्राह्मण ओम् के प्रयोग के सन्दर्भ में उसकी उत्पत्ति का उल्लेख करता है। ओम की उत्पत्ति के विषय में ऐतरेय ब्राह्मण का कथन है कि प्रजापति ने कामना की कि मैं उत्पन्न होकर बहुत होऊं। उसने तप किया। तप करके उसने तीन लोकोंपृथिवी, अन्तरिक्ष तथा द्यौको उत्पन्न किया। उसने पुन: इन तीन लोकों को तपाया; इन अभितप्त तीन लोकों से क्रमश: तीन ज्योतियांअग्नि, वायु तथा आदित्य-उत्पन्न हुईं। उसने पुन: इन तीन ज्योतियों को तपाया; इन अभितप्त तीन ज्योतियों से क्रमश: तीन वेदऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदउत्पन्न हुये। उसने पुन: इन तीन वेदों को तपाया, इन अभितप्त तीनों वेदों से क्रमश: तीन शुक्रभू:, भुव: तथा स्व:उत्पन्न हुये। उसने पुन: इन तीन शुक्रों को तपाया, इन अभितप्त तीनों शुक्रों से क्रमश: तीन वर्ण अ, , म् उत्पन्न हुये। इन तीन वर्णों को उसने एक साथ कर दिया जिससे ओम् पद की उत्पत्ति हुई। इसलिये सबका सार तत्त्व होने के कारण होता सर्वत्र मन्त्र के उच्चारण में ओम् रूप प्रणव का प्रयोग करता है।८ गोपथ ब्राह्मण में ओम् के विषय में ३६ प्रश्न पूछे गये हैं और उनका समाधान भी किया गया है। इन्हीं ३६ प्रश्नों के द्वारा ओंकार का विवेचन किया गया है।९ ओम् में धातु क्या है? प्रातिपदिक क्या है ? इसमें नाम और आख्यात क्या है ? लिंग क्या है ? वचन क्या है ? विभक्ति कौन है ? प्रत्यय कौन है ? इसका स्वर कौन है ? उपसर्ग क्या है ? निपात कौन-कौन हैं ? इसमें पद कितने हैं ? इसमें संयोग क्या है ? इसका स्थान, अनुप्रदान, करण क्या है ? इसकी शिक्षा ग्रहण करने वाले इसका उच्चारण कैसे करते हैं ? इसका छन्द क्या है ? इसका वर्ण क्या है? आदि-आदि।

ओम् पद किस धातु से बना हैइस विषय में गोपथ ब्राह्मण तीन धातुओं का उल्लेख करता हैङ्गआपृ, ङ्गअव तथा ङ्गआपि। ङ्गआपृ धातु से ओम् के निर्वचन का कारण है इसका सर्वव्यापक होना।

 ब्रह्माण्ड में सर्वत्र भरा होने के कारण ओम् यह संज्ञा है। ङ्गअव धातु रक्षा, गति आदि अनेक अर्थों में प्रवृत्त है इसलिये ओम् पद के अव से निर्वचन का कारण है इसका सबकी रक्षा करना। ओम् सबकी रक्षा करता है इसलिए उसकी यह संज्ञा है। रूप की समानता से अर्थ की समानता प्रबल होती है, इसलिये गोपथ ब्राह्मण ङ्गआपि धातु से ओम् पद के निर्वचन को प्रमुखता देता प्रतीत होता है। ओम् सर्वत्र व्याप्त है इसलिये यह व्याप्ति अर्थ की वाचक ङ्गआपि धातु से निष्पन्न है।१०

ङ्ग अव धातु से ओम् पद का निर्वचन मानने पर अव् का सम्प्रसारण से ङे - रूप विकार होकर पुन: गुण होकर रूप बनता है। ङ्ग आपि धातु से निष्पन्न मानने पर आ का ओ तथा पकार का म् होकर ओम् पद बनता है। यह एकाक्षर गोपथ ब्राह्मण के अनुसार दो वर्णों वाला एकाक्षर ओम् पद निष्पन्न होता है।११ गोपथ ब्राह्मण ओम् को निपात अतएव अव्यय मानता है। इसका कृदन्तयुक्त प्रातिपदिक रूप क्या है दिखाई नहीं पड़ता।१२ ओम् पद के स्वरविषयक वैशिष्ट्य का उल्लेख करते हुये गोपथ ब्राह्मण बताता है कि स्वरितोदात्त एकाक्षर ओंकार ऋग्वेद में प्रयुक्त होता है; त्रैस्वर्योदात्त एकाक्षर ओम् यजुर्वेद में, दीर्घप्लुतोदात्त एकाक्षर ओम् सामवेद में तथा ह्रस्वोदात्त एकाक्षर ओम् पद अथर्ववेद में प्रयुक्त होता है।१३ ओम् की कितनी मात्राएं होती हैं इस विषय में गोपथ ब्राह्मण का कथन है कि इसके प्रारम्भ में अर्थात् ओ के उच्चारण में तीन मात्रायें होती हैं क्योंकि अभ्यादान में यह सदा प्लुत होता है। मकार की एक मात्रा होती है। इस प्रकार ओम् में कुल चार मात्रायें हैं।१४

गोपथ ब्राह्मण इस बात का भी उल्लेख करता है कि पूर्व के आचार्य ओम् पद के उच्चारण में बड़ी सावधानी बरतते थे। वे इसके आख्यात उपसर्गअनुदात्त-स्वरित-लिङ्ग-विभक्ति-वचन आदि के पूर्ण ज्ञाता थे और अपनी परिषदों में इसका अध्ययन-अध्यापन करते थे१५। ओम् का छन्द क्या है इस विषय में गोपथब्राह्मण का कथन है कि इसमें गायत्री छन्द है; देवताओं की गायत्री एकाक्षर होती है१६

वेद में ओम् रूप प्रणव को एक विशिष्ट मन्त्र के रूप में भी माना गया है। इसलिये इस मंत्र के जप का विधान भी मिलता है। वैदिक परम्परा में किसी भी मन्त्र का ऋषि, देवता तथा छन्द का उल्लेख न किया जाये तब तक उस मन्त्र का जप भी नहीं किया जा सकता। ब्रह्म प्रजापति ही इस मन्त्र के द्रष्टा ऋषि हैं। ओम् का उच्चारण चारों वेदों के उच्चारण से पूर्व किया जाता है इसलिये ओम् चारों वेदों का प्रतिनिधित्व करता है। चारों वेदों का सार होने से भी इसका सम्बन्ध चारों वेदों से है। ओम् चारों वेदों की समान व्याहृति है जबकि भू:, भुव: तथा स्व: अलग अलग वेदों की व्याहृतियां हैं।१७ इसलिये ब्रह्मवादी ओम् रूप प्रणव का उच्चारण सबसे पहले करते हैं।१८ सभी मन्त्रों की व्याहृति के रूप में ओम् उच्चरित होता है किन्तु यह अपनी व्याहृति स्वयं है।

ओम् के देवता का विचार वेद और मात्रा दोनों दृष्टियों से किया गया है। ओम् का उच्चारण चारों वेदों के उच्चारण से पूर्व किया जाता है इसलिये चारों वेदों के देवता, ज्योति, छन्द तथा स्थान ओम् के भी होते हैं। चूँकि ऋचाओं का देवता अग्नि है, अग्नि ही ज्योति है, गायत्री छन्द है, पृथिवी स्थान है, इसलिये ऋग्वेद रूप ओम् के देवता भी अग्नि, ज्योति अग्नि, छन्द गायत्री तथा स्थान पृथिवी है। यजुषों का देवता वायु, छन्द त्रिष्टुप् तथा स्थान अन्तरिक्ष है। सामों का देवता आदित्य है, वही उसकी ज्योति है, जगती छन्द है तथा द्युलोक स्थान है, इसलिये सामवेद रूप ओम् के देवता आदित्य, ज्योति आदित्य, छन्द जगती तथा स्थान द्युलोक है। आथर्वण मन्त्रों के देवता चन्द्रमा, वही उसकी ज्योति, इसके सभी छन्द तथा आप: स्थान है, इसलिये आथर्वण रूप ओम् के देवता चन्द्रमा, उसकी ज्योति, सभी छन्द तथा स्थान आप: है।१९ इस प्रकार ओम् रूप प्रणव में सभी वेदों के देवता, ज्योति, छन्द तथा लोक प्रतिष्ठित हैं।

ओम् रूप प्रणव की मात्राओं के देवता, वर्ण तथा उसकी उपासना का विवेचन गोपथ ब्राह्मण में मिलता है। ओम् का अ उ म् रूप विभाग करके उसकी साढ़े-चार मात्रायें मानी गई हैं। अ तथा उ की दो-दो मात्रायें तथा म् की अर्ध मात्रा मिलाकर साढ़े चार मात्राएं होती हैं। ओम् की साढ़े चार मात्राओं में से जो प्रथम मात्रा है, वह ब्रह्मदेवत्य है और उसका वर्ण लाल है। जो व्यक्ति उस प्रथम मात्रा का नित्य ध्यान करता है या उपासना करता है वह ब्रह्मा के पद को प्राप्त करता है।२० जो दूसरी मात्रा है वह विष्णु देवता है और उसका वर्ण कृष्ण है। जो व्यक्ति उस मात्रा का ध्यान करता है वह विष्णु के पद को प्राप्त करता है।२१ जो तीसरी मात्रा है वह ईशान देवता है और उसका वर्ण कपिल है। जो व्यक्ति उस तृतीय मात्रा का ध्यान करता है वह ईशान अर्थात् शिव के पद को प्राप्त करता है। जो अन्तिम डेढ़ चतुर्थी मात्रा है वह सर्वदेवत्य है, वही व्यक्त होकर आकाश में सर्वत्र विचरण करती है। उसका वर्ण शुद्ध स्फटिक के समान स्वच्छ है। जो व्यक्ति इस मात्रा की उपासना करता है वह नामरहित अव्यय पद को प्राप्त करता है।२२ ओम् की साढ़े चार मात्राओं की उपासना में उसके ब्रह्मा, विष्णु महेश तथा नामरूपरहित ब्रह्म के स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है।

          यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेत् पदमनामकम्। (गो.ब्रा. १.१.२५)

 ओम् रूप प्रणव की साकार उपासना का भी संकेत गोपथ ब्राह्मण करता है। इन्द्र ने प्रजापति से पूछा कियह ओंकार क्या है ? किसका पुत्र है ? इसका आकार (छन्द) क्या है ? इसका वर्ण क्या है ? इससे ब्रह्मा ब्रह्मत्व को कैसे प्राप्त करते हैं ?२३ इसका उत्तर यह दिया गया है कि वह ओंकार लातव्य गोत्र वाला है, ब्रह्मा का पुत्र है, गायत्र उसका छन्द है, शुक्ल वर्ण है, वह पुरुष वत्स है, रुद्र देवता है।२४

गोपथ ब्राह्मण ओंकार की आध्यात्मिक उपासना का भी उल्लेख करता है। यह ओंकार अध्यात्म, आत्मभैषज्य तथा आत्मकैवल्य रूप है।२५ ओम् की उपासना से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है यही आत्मकैवल्यम् पद से अभिव्यक्त होता है। मुण्डकोपनिषद् में शौनक को ब्रह्मविद्या का उपदेश करते समय महर्षि अंगिरा ने प्रणव को एक धनुष के रूप में वर्णित किया है। आत्मा बाण है, ब्रह्म लक्ष्य है। प्रणव रूपी धनुष पर आत्मा रूपी बाण को चढ़ाकर व्यक्ति ब्रह्म रूप लक्ष्य का भेदन प्रमादरहित होकर करे।२६ मुण्डकोपनिषद् के इस कथन से ज्ञान होता है कि ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति में प्रणव एक प्रमुख साधन है। कठोपनिषद् में ओम् रूप प्रणव ही ब्रह्म है, उसी की प्राप्ति में वेदाध्ययन, तपस्या, ब्रह्मचर्य आदि सभी साधन हैं।२७ उसी अक्षर ब्रह्म को जानकर सब कुछ प्राप्त हो सकता है।२८ मुण्डकोपनिषद् की तरह श्वेताश्वतर उपनिषद् भी प्रणव को ब्रह्म के ध्यान के लिये साधन मानते है। जिस प्रकार दो अरणियों के मन्थन से अग्नि को उत्पन्न किया जाता है, उसी प्रकार शरीररूपी अधरारणि तथा प्रणव रूप उत्तरारणि से ध्यान रूप मन्थन के अभ्यास से अर्थात् बार-बार ओम् रूपी प्रणव का ध्यान जप करने से अग्नि की तरह शरीरस्थ निगूढ़ ब्रह्म को देखना चाहिये।२९ ध्यान के परिणामस्वरूप मनुष्य ब्रह्म साक्षात्कार करके ब्रह्मानन्द-रूप सोम को पीकर समस्त विष को सारहीन कर देता है।३०

उपर्युक्त विवेचन से एक बात तो स्पष्ट है कि यजुर्वेद से लेकर वेदांग पर्यन्त समस्त वैदिक वाङ्मय से ओम् को ही प्रणव के रूप में स्वीकार किया गया है। ओम् और प्रणव अलग नहीं। ओम् ब्रह्म की उपासना में साधन भी है और स्वयं ब्रह्म के रूप में उपासना का साध्य भी है, यही परम देव भी है। इसीलिये पतञ्जलि ने प्रणव को परमात्मा या परम ब्रह्म का वाचक माना।

  संदर्भ सूची-

१.   प्रयत: प्रणवो नित्यं परमं पुरुषोत्तमम्।

          ॐकारं परमात्मानं तन्मे मन: शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (आश्वसं. १०.१७१.२२)

          संपा. प्रो. व्रजबिहारी चौबे, होशियारपुर।

२.   तस्मादोंकार ऋच्यृग्भवति, यजुषि यजु:, साम्नि साम, सूत्रे सूत्रं, ब्राह्मणे ब्राह्मणं, श्लोके श्लोक:, प्रणवे प्रणव इति ब्राह्मणम्॥ (गो.ब्रा. १.१.२३)

३.   अध्यात्ममात्मभैषज्यमात्मकैवल्यमोंकार:। आत्मानं निरुध्य सङ्गममात्रीं भूतार्थचिन्तां चिन्तयेत्। अतिक्रम्य वेदेभ्य: सर्वपरमध्यात्मकलं प्राप्नोतीत्यर्थ:। (गो.ब्रा. १.१.३०)

४.   सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण व्रवीम्योमित्येतत्॥ (कठो. १.२.१५)

५.   वसोर्धारामैन्द्रं नगरम्। तदसुरा: पर्यवारयन्त। ते देवा भीता आसन्-क इमानसुरानपहनिष्यतीति। तं ओकारं ब्रह्मण: पुत्रं ज्येष्ठं ददृशु:। ते तमब्रुवन्-भवता मुखेनेमानसुराञ्जयेमेति। स होवाच-किं मे प्रतीवाहो भविष्यतीति। वरं वृणीष्वेति। वृणा इति। स वरमवृणीतन मामनीरयित्वा ब्राह्मणा ब्रह्म वदेयु:, यदि वदेयुरब्रह्म तत् स्यादिति। तथेति। ते देवा देवयजनस्योत्तरार्धेऽसुरै: संयत्ता आसन्। तामोंकारेणाग्नीध्रीयाद् देवा असुरान् पराभावयन्त। तद् यत् पराभावयन्त तस्मादोंकार: पूर्वमुच्यते। (गो.ब्रा. १.१.२३)

६.   यो ह वा एतमोंकारं न वेदावश: स्यादिति। अथ य एवं वेद ब्रह्मवश: स्यादिति। (गो.ब्रा. १.१.२३)

७.   तस्मादोमित्येव प्रतिगृणीयात्, तद्धि सत्यं तद्देवा विदु:। (श.ब्रा. ४.३.२.१३)

८.   प्रजापतिरकामयत प्रजायेय भूमान् स्यामिति। स तपोऽतप्यत, स तपस्तप्त्वेमाँल्लोकानसृजत पृथिवीमन्तरिक्षं दिवम्। ताँल्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रीणि ज्योतींष्यजायन्ताग्निरेव पृथिव्या अजायत, वायुरन्तरिक्षादादित्यो दिव:। तानि ज्योतींष्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयो वेदा अजायन्त ऋग्वेद एवाग्नेरजायत यजुर्वेदो वायो: सामवेद आदित्यात्। तान्वेदानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रीणि शुक्राण्यजायन्त भूरित्येव ऋग्वेदादजायत भुव इति यजुर्वेदात् स्वरिति सामवेदात्। तानि शुक्राण्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयो वर्णा अजायन्ताकार उकार मकार इति। तानेकधा समभरत्तदेतदोमिति तस्मादोमिति प्रणौति। (ऐ.ब्रा. ४.३२)

९.   ओंकारं पृच्छाम:को धातु: ? किं प्रातिपदिकम् ? किं नामाख्यातम् ? किं लिंगम् ? किं वचनम् ? का विभक्ति: ? को विकार: ? को विकारी ? कति मात्र: ? कतिवर्ण: ? कत्यक्षर: ? कति पद: ? क: संयोग: ? किं स्थानानुप्रदानकरणम् ? शिक्षका: किमुच्चारयन्ति ? किं छन्द: ? को वर्ण इति प्रश्ना: ? (गो.ब्रा. १.१.२४)

१०.  को धातुरितिआपृधातु:, अवतिमप्येके। रूपसामान्यादर्थसामान्यं नेदीय:। तस्मादापेरोंकार: सर्वमाप्नोतीत्यर्थ:। (गो.ब्रा. १.१.२६)

११.   को विकारीतिअवते: प्रसारणम्, आप्नोतेराकारपकारविकार्यौ। आदित: ओकारो विक्रियते, द्वितीयो मकार:। एवं द्विवर्ण एकाक्षर ओमित्योंकारो निर्वृत:। (गो.ब्रा. १.१.२६)

१२.  कृदन्तमर्थवत् प्रातिपदिकमदर्शनं प्रत्ययस्य नाम संपद्यते, निपातेषु चैनं वैयाकरणा उदात्तं समामनन्ति तदव्ययीभूतमन्वर्थवाची शब्दो न व्येति कदाचनेति। (गो.ब्रा. १.१.२६)

१३.  स्वरितोदात्त एकाक्षर ओंकार ऋग्वेदे, त्रैस्वर्योदात्त एकाक्षर ओंकारो यजुर्वेदे, दीर्घप्लुतोदात्त एकाक्षर ओंकार: सामवेदे, ह्रस्वोदात्त एकाक्षर ओंकारोऽथर्ववेदे। (गो.ब्रा. १.१.२५)

१४.  कतिमात्र इति-आदेस्तिस्रो मात्रा: अभ्यादाने हि प्लवते मकारश्चतुर्थी। (गो.ब्रा. १.१.२७)

१५.  आख्यातोपसर्गानुदात्तस्वरितलिङ्गविभक्ितवचनानि च संस्थानाध्यायिन आचार्या: पूर्वे बभूवु:। श्रवणादेव प्रतिपद्यन्ते न कारणं पृच्छन्ित। (गो.ब्रा. १.१.२७)

१६.  किं छन्द इतिगायत्रं हि छन्द:। गायत्री वै देवानामेकाक्षरा श्वेतवर्णा च व्याख्याता। (गो.ब्रा. १.१.२७)

१७.  एषा व्याहृतिश्चतुर्णां वेदानामानुपूर्वेणों भूर्भुव: स्वरिति व्याहृतय:। (गो.ब्रा. १.१.२७)

१८.  तस्माद् ब्रह्मवादिन: ओकारमादित: कुर्वन्ति। (गो.ब्रा. १.१.२८)

१९.  किं देवतामितिऋचामग्िनर्देवतं, तदेव ज्योति:, गायत्रं छन्द:, पृथिवी स्थानम्। ... यजुषां वायुदेवतं तदेव ज्योति:, त्रैष्टुभं छन्द:, अन्तरिक्षं स्थानम्। ... साम्नामादित्यो देवतं, तदेव ज्योति:, जागतं छन्द:, द्यौ: स्थानम्। ...अथर्वणां चन्द्रमा देवतं, तदेव ज्योति:, सर्वाणि छन्दांसि, आप: स्थानम्। (गो.ब्रा. १.१.२९)

२०.  उदात्तोदात्तद्विपद अ उ इत्यर्धचतस्रो मात्रा मकारे व्यञ्जननामित्याहु:। या सा प्रथमा मात्रा ब्रह्मदेवत्या रक्ता वर्णेन। यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद् ब्राह्मं पदम्। (गो.ब्रा. १.१.२५)

२१.  या सा तृतीया मात्रैशानदेवत्या कपिला वर्णेन।

          यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेदैशानं पदम्। (गो.ब्रा. १.१.२५)

२२.  या सार्धचतुर्थी मात्रा सर्वदेवत्या व्यक्तीभूता खं विचरति शुद्धस्फटिकसन्िनभा वर्णेन।

          यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेत् पदमनामकम्। (गो.ब्रा. १.१.२५)

२३.  इन्द्र: प्रजापतिमपृच्छत्भगवन्! अभिष्ट्य पृच्छामीति। पृच्छ वत्सेत्यब्रवीत्। किमयमोंकार: कस्य पुत्र:, किं चैतच्छन्द:, किं चैतद्वर्ण:, किं चैतद् ब्रह्मा ब्रह्म संपद्यते ? तस्माद् वै तद्  मद्रमोंकारं पूर्वमालेभे। (गो.ब्रा. १.१.२५)

२४.  तस्माद् ब्राह्मणवचनमादर्तव्यम्यथा लातव्यो गोत्रा, ब्रह्मण: पुत्रो, गायत्रं छन्द: शुक्लो वर्ण: पुंसो वत्सो, रुद्रो देवता, ओंकारो वेदानाम्। (गोब्रा. १.१.२५)

२५.  अध्यात्ममात्मभैषज्यमात्मकैवल्यमोंकार:। आत्मानं निरुध्य सङ्गममात्रीं भूतार्थचिन्तां चिन्तयेत्। अतिक्रम्य वेदेभ्य: सर्वपरमध्यात्मकलं प्राप्नोतीत्यर्थ:। (गो.ब्रा. १.१.३०)

२६.  प्रणवो धनु: शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।

          अप्रमत्तेन बेधव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥ (मु. उप. २.२.४)

२७.  सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति

          यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण व्रवीम्योमित्येतत्॥ (कठो. १.२.१५)

२८.  एतदेवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम्।

          एतद्धेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्॥

          एतदालम्वनं, श्रेष्ठमेतदालम्वनं परम्।

          एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते॥ (कठो. १.२.१६-१७)

२९.  स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्।

          ध्याननिर्मन्थनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत्॥ (श्वे. उप. १.१४)

३०.  ब्राह्मणो यज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्य:।

          स सोमं प्रथम: पपौ स चकारारसं विषम्॥

          (अथर्व. ४.६.१)