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Proceedings of one day seminar on

Dr. FATAH SINGH - HIS LIFE AND WORKS

(27th April, 2008)

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Veda interpretation based on vedic glossary - Dr.(Mrs.) Pravesh Saksena

Vedic Symbolism based on vedic glossary - Dr. Abhaya Dev Sharma

Importance of Veda in daily life - Prof. (Mrs.) Yogini Himanshu Vyas

A survey of Vedic Etymology - Dr. Shashi Tiwari

A survey of Vedic monotheism and Omkar - Dr. Aruna Shukla

Vedic Darshan - A direction and thought - Dr. Pratibha Shukla

A survey of Dhai Akshar Ved Ke - Dr. Shashi Prabha Goyal

Vedic view of Arya - Shudra controversy - Dr. Surendra Kumar

Dayanand and his vedic interpretation - Shri Gopal Swami Sarasvati

A survey of Kamayani  -  Smt. Sushma Pal Malhotra

Summary of Proceedings - Dr. Shashi Prabha Goyal

 

 

 

प्राचीन परंपरा पर आधारित वेदभाष्यपद्धति

ऋग्वेद सूक्त १०.५३ के संदर्भ में

-         प्रवेश सक्सेना

वेदभाष्यपद्धति के बहुत से आयाम हैं बहुत से रूप हैं। पद्धतियों की भिन्नता के कारण मंत्रों के अर्थ भी भिन्न-भिन्न हो जाते हैं। चिर प्राचीन वेद अलग-अलग काल-खंडों में अलग-अलग विद्वानों तथा भाष्यकारों के द्वारा समझा-समझाया गया है। कुल मिला कर दस से भी अधिक वेदार्थ-प्रक्रियाएं सामने आ चुकी हैं। पर वेदार्थ है कि अभी भी नए आयाम प्रस्तुत करता ही रहता है। यहां सभी प्रक्रियाओं का नामोल्लेख या चर्चा करना अनावश्यक होगा। केवल यही जानना ज़रूरी है कि वेदभाष्यपद्धति के कितने भी रूप क्यों न रहे हों विद्वज्जन निर्वचनपरक पद्धति को महत्त्व देते रहे हैं। वास्तव में वैदिक शब्दों के निर्वचनों से ही आधिदैवत, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक व्याख्याएं करना सरल-संभव हो सका है। फिर भी वेदव्याख्याकार अपने मत को प्रतिपादित करने के लिए पौराणिक परंपरा या आख्यानादि का प्रयोग भी करते रहे हैं। भले ही सर्वसम्मति से उसे प्रामाणिक न माना जा सके। दूसरी ओर एक अन्य, प्रवृत्ति भी सदा से विद्यमान रही है कि वेद को वेद से समझा जाए। अर्थात् वेद को वेदब्राह्मणारण्यकोपनिषदों के संदर्भों से जोड़ कर समझा जाए। इसी संदर्भ में वेदांगों की भी सकारात्मक भूमिका सदा रही है/रहेगी ही। हां, यह भी ध्यान रखना होगा कि भारतीय-परंपरा में वेदार्थ की कितनी भी विभिन्नताएं क्यों न हो अध्यात्म को यहां सर्वोपरि महत्ता दी गई है। अतः २१वीं सदी के इस युग में भी मानवता की अनेक नैतिक-मनोवैज्ञानिक समस्याओं का समाधान वेदमंत्रों की व्याख्याओं के अनुसार करने का प्रयास किया जा रहा है। सच में वैदिक ऋषि वैदिक कवि स्थूल प्रतीकों के द्वारा सूक्ष्म आध्यात्मिक रहस्यों का वर्णन करने में समर्थ रहा है।

यहां एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न अक्सर उठाया जाता रहा है भूत काल में भी आधुनिक युग में भी कि वेदों के निश्चित अर्थ क्यों नहीं हैं? क्यों वेद के अनेक शब्दों की अनेकानेक विकल्पात्मक निरुक्तियां हैं कि मंत्रों की बहुविध व्याख्याएं प्रस्तुत की जाती रही हैं। इन सब बातों से लगता है कि वेदमंत्रों के वास्तविक अर्थ की खोज न हो सकने के कारण वैकल्पिक अर्थों अथवा एकाधिक अर्थों का आश्रय लिया गया। उधर मीमांसक कहते हैं कि वेद अपौरुषेय हैं, स्वतः प्रमाण है। इनमें अर्थपरिवर्तन नहीं होता और न ही किया जा सकता है। इस प्रकार की विचारधाराएं नए वेदशोधार्थी को भ्रमित करती हैं। परंतु वेद की महत्ता, वेद की विशेषता, वेद का ऐश्वर्य, वेद की अनंतता इसी में है संभवतः कि यहां अर्थ वैविध्य है। श्रुतिपरंपरा से जैसे वेद-पाठ (टैक्स्ट) हमें शुद्धतम रूप में मिला है वैसे ही उसका अर्थ भी यथावत् एवं अक्षुण्णरूप में मिला होता जो स्वयं वैदिक ऋषि को अपने युग में अभीष्ट रहा होगा--तो बहुत अच्छा होता। भले ही हम अपने-अपने युगानुरूप अर्थों को तब भी खोज ही लेते। कारण कि आज के आलोचकों का भी मानना है कि पाठ में (टैक्स्ट) प्रयुक्त शब्दों में अर्थ-सृजन की अनंत संभावनाएं रहती हैं। कालिदास ने शब्दार्थ की प्राप्ति के लिए प्रतिपत्ति शब्द का प्रयोग किया है वह केवल उनके अपने लिए नहीं पाठकों के लिए भी है। रामचरितमानस के प्रणेता ने भी माना है कि पाठ में सन्निहित शब्दों में अर्थ गुपुत रहते हैं--

सूझहिं रामचरितमनिमानिक गुपुत प्रगट जहें जो जेहि खानिक।

गुप्त अर्थों को प्रकट करने की भूमिका पाठक या श्रोता (या आधुनिक युग में शोधार्थी) निबाहते हैं। शब्द से नए-नए अर्थों का दोहन करने की प्रविधि बताने के लिए उन्होंने उपयुक्त बिंब चुना है अर्थात् पाठक एक खानिक पहले शब्द का विश्लेषण करता है फिर शब्द को ख़ान की तरह खोद कर उसमें गोपनीय अर्थों का उद्धार करता है। स्वयं वेद में अपीच्य गुह्य आदि शब्दों का वेदवाणी के लिए प्रयोग क्या यही नहीं दर्शाता? पाश्चात्य समीक्षक बार्थ तथा दैरिदा ने भी पाठार्थ को ले कर ऐसी चुनौतियां उठाई हैं। कौत्स अनर्थका हि मन्त्राः कह कर कहना चाहते हैं कि मंत्रार्थ अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं किया जा सकता। भाव यही कि अनन्ता वै वेदाः और मंत्र भी अनंत अर्थ वाले हैं। पतंजलि ने तो यहां तक कहा कि मंत्र में प्रयुक्त शब्द अर्थ की वृष्टि करते हैं। इसी संदर्भ में वेद मंत्रों का अर्थ कौन कर सकता है? यह चुनौतीपूर्ण प्रश्न भी उठाया गया था। सायण ने वेदमंत्रों के नव अर्थों का दर्शन करने का साहस १४वीं सदी में किया तो शायद यही चुनौतियां रही होंगी। उन्नीसवीं, बीसवीं, सदी में दयानंद तथा अरविंद ने भी क्रमशः यौगिक अर्थ तथा प्रतीकात्मकता को महत्त्व देते हुए वेदमंत्रों के अर्थ किए। अरविंद ने तो कहा जिन सामान्य शब्दों का प्रयोग वेद करता है उनका अर्थ नितांत गूढ़, असामान्य तथा अंतःस्तर की साधना पर आधारित हैं। यही बात उत्तर-आधुनिक दार्शनिक व समीक्षक दैरिदा ने इस प्रकार कही--पाठ में शब्द आशय आच्छादित होते हैं जिसके कारण उनकी आंतरिक पहचान कठिन होती है।

इस संक्षिप्त भूमिका की पृष्ठभूमि में वेदभाष्यपद्धति की प्राचीनतम परंपरा के क्षेत्र में सर्वथा नवीन प्रयोग करने की चुनौती उठाई है वेद-संस्थान ने। यहां वैदिक वाङ्मय के धीर-गंभीर अध्येता डॉ अभयदेव ने निघंटु के आधार पर वेदार्थों को खोजने का सफल प्रयास किया है। निघंटु एक प्राचीनतम वैदिक कोष है जहां वैदिक पदों को संकलित किया गया है। यहां शब्द सूचियों में वैदिक पदों के पर्यायों को एक साथ रखा गया है। वैदिक संस्कृत का सामर्थ्य और ऐश्वर्य है कि एक-एक पद के कहीं-कहीं तो बीस-पच्चीस यहां तक की सौ से भी अधिक पर्याय हैं। जैसे उदकनामानि। वैदिक पदों की व्याख्या ही मुख्यतः निरुक्त के विभिन्न अध्यायों में की गई हैं। निघंटु के पांचवें अध्याय को ही लें उसकी ६ कांडिकाओं में आए शब्द निरुक्त के पांच से ले कर १२ अध्यायों में वर्णित हुए हैं। वर्णित होने का अर्थ की उनकी निरुक्तियां दी गई हैं तथा उनके स्थान निश्चित किए गए हैं। उदाहरण के लिए निघंटु ५., , ३ पृथिवीस्थानी, ., ५ मध्यस्थानी तथा ५.६ के पद द्युस्थानी कहे गए हैं। निघंटु के आधार पर किसी भी वेदमंत्र की व्याख्या करना कई बार चुनौती बन जाता है क्योंकि बहुत से पदों के पर्यायों और उनके स्थानों की दृष्टि से विविधता यहां मिलती है उससे संगति बिठाना बिना वेदाध्ययन की गहराई के असंभव सा लगता है। पर यदि यह कर पाएं तो जैसे एक कुंजी, सी हाथ लग जाती है जिससे गूढ़ से गूढ़ मंत्रों के अर्थ खुलने लगते हैं। डॉ अभयदेव की अध्यक्षता में अनेक सूक्तों के अर्थों पर काम वेद-संस्थान में निरंतर हुआ है/हो रहा है।

आज डॉ फ़तहसिंह की स्मृतिसभा में ऋग्वेद के १०.५३ सूक्त पर इसी ढंग से विचार किया जा रहा है। इस

अध्ययन को तीन खंडों में विभक्त किया गया है। प्रथम में सौचीक ऋषि के इस सूक्त एवं अन्य सूक्तों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। द्वितीय में १०.५३ सूक्त की आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक व्याख्या संक्षेप में प्रस्तुत की गई है। अंतिम खंड में नैघंटुक पद्धति से वेदार्थ करने में क्या बाधाएं, क्या समस्याएं आती हैं--एक सामान्य शोधार्थी के लिए उनकी चर्चा है तथा निघंटु पद्धति की क्या सीमाएं हैं क्या चुनौतियां हैं--इन सबको उठाया गया है।

प्रथम खंड-सौचिक ऋषि दृष्ट सूक्तों का परिचय

सौचिक ऋषि दृष्ट सूक्त १०.५३ देवों (विश्वेदेवाः) तथा अग्नि के मध्य संवाद-रूप में है। यों प्रायः इसे अन्य संवाद-सूक्तों में परिगणित नहीं किया गया है। परंतु डॉ. रामनाथ वेदालंकार ने अपने शोध-ग्रंथ वेदों की वर्णनशैलियां (पृ. १४२) में इसे संवादात्मक शैली का सूक्त माना है। इस सूक्त के अतिरिक्त सौचीक ऋषि के चार अन्य सूक्त भी हैं जिनकी संख्या इस प्रकार है--ऋग्वेद १०.५१, १०.५२ (प्रस्तुत १०.५३) तथा ऋग्वेद १०.७९ तथा १०.८० (जिनमें अन्य ऋषि भी गिनाएं गए हैं) इन सबमें कुल मिला कर ४० मंत्र हैं। इनमें से ५१ तथा ५२ में भी देवों का अग्नि से संवाद है। स्वयं देवों में से अग्नि को ऋषि माना गया है तो दूसरी ओर देवों को भी ऋषि माना गया है।

सौचिक ऋषि के दर्शन को समझने से पहले उनके नाम का अर्थ समझना होगा। वास्तव में इन मंत्रों में जहां अग्नि ऋषि है उसके विशेषण के रूप में (या गोत्र रूप में) सौचीक है। सौचीक का अर्थ हुआ--अर्थात् सुचीक की संतान तथा ऐसे गोत्र या विशेषण वाला अग्नि इन मंत्रों का द्रष्टा है। वास्तव में श् स् के अभेद (उच्चारणभेद के कारण) के कारण इसे शौचीक भी कहा गया है। निरुक्त के व्याख्याकार दुर्गाचार्य ने शुचीक शब्द का ही प्रयोग किया है जिसका अर्थ (मोनियर विलियम्स के कोष में भी) पवित्र करने वाला Cleaner या Cleanser दिया गया है। वैसे भी अग्नि का एक नाम (या पर्याय) वेद में (लोक में भी) पावक भी है। तो शुचीक का पुत्र शौचिक हुआ वह भी पवित्र या संशोधित करने वाला ही माना जाएगा। मंत्रार्थ करते हुए यह याद रखने से सरलता रहेगी।

वैदिकपदानुक्रम-कोष में सौचीक या सुचीक को सूचि से निष्पन्न माना है जिसका अर्थ होता है सूचना ढूंढना, खोजना इत्यादि। इस दृष्टि से सौचीक होगा एक खोजी, एक अन्वेषक। ऐसा लगता है यह शब्द कहीं किसी वेदांग में win किया गया। इन दोनों अर्थों को ले कर इन सूक्तों के अर्थों को, अभिप्रायों को समझने में सुविधा होगी।

सौचीक। शौचीक ऋषिदृष्ट १०.५१ तथा १०.५२ में राधेकृत (Roth) आलोचना में बताया गया है कि यहां पौराणिक तत्त्व (Pauraanic Element) प्राप्त होता है परंतु १०.५३ में इसका अभाव है। वेद में पुराणतत्त्व कुछ विलक्षण बात तो लगती है पर कहीं-कहीं वह है तो। १०.५१ में एक कथानक की ओर संकेत है जो तैत्तिरीय ब्राह्मण में भी मिलता है। अग्नि सौचीक। शौचीक चार भाइयों में सबसे छोटा है। सबसे बड़ा भूपति, दूसरा भुवनपति, तीसरा भूतों का पति था। यज्ञ द्वारा यजमान जो हवि अर्पित करते थे उसे तीनों बड़े भाई देवों के लिए वहन करते थे। अतः वे हव्यवाहन थे। यह कार्य करते-करते वे समाप्त हो गए(समाप्त होने का अर्थ है बुझ गए निरन्तर आहुतिद्रव्य डालते रहने पर)।  अब सौचीक। शौचीक की बारी आई। वह डर गया और कहीं जा छिपा। देव उसे ढूंढते फिरे। आखिर में पानी की मछलियों  ने बता दिया कि यहां (पानी में) वह छिपा हुआ है(यह पानी नदियों या समुद्र किसी का भी हो सकता है)। देवों ने पकड़ लिया उसको। तब उनका (देवों) तथा अग्नि का संवाद हुआ जो १०.५१-५३ इन तीन सूक्तों में हुआ है।

सरसरी निगाह से देखें तो बड़ी बचकानी (childish) सी कथा लगती है यह। यदि अग्नि (सौचीक। शौचीक) देव स्वयं डर कर छिप जाए तो भला वह क्या देव हुआ? या क्या अग्रणी परमात्मा हुआ। इसलिए अन्यथा समझने की कोशिश करनी होगी। अग्नि के विभिन्न रूप हैं। ऋग्वेद के प्रथम मंत्र में ही अग्नि के पच रूप हैं। १०.५१ में दश रूप गिनाए गए हैं। ये सब मात्र उपलक्षण हैं। तीनों लोकों में तीन रूप हैं अग्नि के--द्यौ में सूर्य, अंतरिक्ष में विद्युत् (इंद्र) तथा पृथ्वी पर अग्नि अग्निः सर्वाः देवताः के द्वारा सभी देव अग्नि में समाहित हो जाते हैं। फिर दावाग्नि, वडवाग्नि, जठराग्नि जैसे रूप भी हैं। जहां तक पार्थिव अग्नि का प्रश्न है जो अरणिमंथन से उत्पन्न होता है--वह अपनी ऊर्ध्वमुखी ज्वालाओं के माध्यम से मंत्रोच्चार-पूर्वक डाली गई आहुतियों को अन्य देवों तक वहन करता है। पवन या वायु देव अग्नि की आहुति से सुगंधित होता ही है। विशाल स्तर पर किए यज्ञ का धूम भी ऊपर-ऊपर पहुंच कर मेघ-संरचना में कुछ न कुछ योगदान करता है। पर अग्नि का मात्र यही दौत्यकर्म या हव्यवाहन रूप स्वीकार्य नहीं है। अतः उसके अन्य रूप जो तिरोहित (छिपे-छिपे) या पुरोहित (संमुख प्रकट) दोनों ही हैं उनकी खोज करता है यह सौचीक ऋषि। जहां तक विश्वे देवाः--सब देवों की अवधारणा का प्रश्न है यह भी अपने आपमें विलक्षण है जो विश्व के किसी धार्मिक-साहित्य में नहीं मिलती। देवों की कुल संपूर्णता यानी Totality। ३३३९ की संख्या (१०.५२.) यहां दी गई है। ये सब अग्नि की उपासन (सपर्या) करते हैं। और देव होते हैं कौन? दानात्, दीपनात् द्योतनात्--दान देने वाले, दीप्त रहने वाले, दीप्त करने वाले देव होते हैं। फिर सब प्रकृति के तत्त्व ही नहीं, मानवसमाज में भी सभी समर्पणपूर्वक कर्म करने वाले देव हैं। अब विश्वेदेवाः-- सब देवों को एक ओर अपने श्रेष्ठतम, प्रशस्ततम कर्म के लिए अग्नि चाहिए। अंगिरस जैसे ऋषि जन अराणिमंथन कर अग्नि का प्रथम बार जब आविष्कार करते हैं--तिरोहित को पुरोहित करते हैं तब वह एक महत्त्वपूर्ण अवसर होता है। जलों में, ओषधियों में, तमस् में यह अग्नि तिरोहित रूप में रहता है--इसे सौचीक भी मानते हैं। पर उनकी भूमि का पानी में छिपकर बैठे अग्नि अर्थात् वडवाग्नि (submarine fire) के आविष्कार की है। अग्नि का शमन करने वाला जल भी अपने भीतर अग्नि छिपाए है--इस तथ्य का उद्घाटन संभवतः विश्वेदेवाः करते हैं। और उन्होंने वहां अग्नि है ऐसा जाना कैसे? मत्स्यों ने बताया। वडवाग्नि जब प्रचंड(किं वा प्रशमहेतुना वारिणा न प्रचण्डीतरी भवति पावकः बाणभट्ट)  होती है तो जल-चर घबड़ा कर बाहर सतह पर आ जाते हैं। जल-ऊर्जा (hydroenergy) की ओर संकेत भी हो सकता है यहां पानी से बिजली बनाने की प्रक्रिया संभवतः ऐसे ही सीखी गई होगी। सौचीक तो है ही खोजी, अन्वेषक।

सौचीक को शौचीक अर्थात् पावक मानें, पवित्रकर्ता मानें तो इसे अन्य तरह व्याख्यायित करना होगा। वास्तव में अग्नि जो ताप, ऊर्जा, प्रकाश व ऊष्मा का देव है उसका हम केवल मात्र कर्मकांडपरक कार्यों में उपयोग करें तो यह तो दुरुपयोग हुआ। सबसे बड़ी विशेषता इस तत्त्व की (अन्य तत्त्वों की भी है) अपनी शोधक प्रक्रिया है। अग्नि हमारे पचतत्त्वात्मक तनुओं का भी एक घटक है। स्वर्ण तक अग्नि में तप कर कालिमामुक्त हो कर और चमकता है। अग्नि में यह शोधक गुण ही अनेक कीटाणुओं, रोगाणुओं व अन्य दोषों को समाप्त कर देता है। ऐसे शौचीक (पावक अग्नि की खोज करते हैं देव।)

विश्वेदेवाः याज्ञिक अग्नि के भक्त तो थे ही अग्नि के भिन्न-भिन्न रूपों को भी जानते थे जब उन्हें वडवाग्नि के रूप में जल में स्थित ऊर्जा के दर्शन हुए तो वे बहुत प्रसन्न हुए। या कहें मात्र हव्यवाहन रूप से संतुष्ट न हो कर उन्होंने अग्नि के पवित्रकर्ता या शोधनकर्ता रूप को जानने की कोशिश की। ये कोशिशें, ये प्रयत्न जारी रहे; १०.७९ तथा १०.८० में जिनका वर्णन है। १०.७९ सूक्त में दावाग्नि का विस्तार से उल्लेख हुआ है। यही नहीं अग्नि को यहां, मनुष्यों के उदरों में स्थित बताया है। वैश्वानर जो अन्न को पचाता है। सूक्त १०.८० में नारी को वीर प्रसाविनी बनाने का उल्लेख है तथा कुछ पौराणिक तत्त्व भी उल्लिखित हैं। १०.८०.३ में जरत्कर्ण व अत्रि की रक्षा करने का तथा जरूथ नामक राक्षस को भस्म करने का उल्लेख हैं। प्राचीन आख्यान ही लगते हैं ये सब। १०.८० की एक विशेषता यह भी है कि यहां प्रत्येक मंत्र अग्नि (विभिन्न विभक्तियों में) से शुरू होता है। पर एक बात स्पष्ट है कि सौचीक ऋषि का दर्शन मात्र आधिभौतिक वा आधिदैविक स्तर तक नहीं सिमटा है। उन्होंने उसके आध्यात्मिक रूप को समझने का प्रयास भी किया है तथा उसमें सफल भी हुए हैं। यही कारण है कि १०.५१.५ में मनु, मननशील जन को देवयुः--देवों को चाहने वाला तथा यज्ञ की कामना करने वाला बताया गया है। १०.५२.१ में ऐसे मनु के लिए स्तुति की गई है (मनवै वृतः) तथा सूक्त १०.७९ में अमर्त्य अग्नि के महान् सामर्थ्य को मर्त्य सृष्टि में देखा है। अग्नि अत्ता, है खेलते-न खेलते अपने कार्यों को समाप्त कर देता है।

द्वितीय खंड

१०.५३ की आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक व्याख्या

सौचीक के अन्य सूक्तों की तुलना में प्रस्तुत सूक्त १०.५३ एक विशिष्ट सूक्त है जिसे निम्नलिखित रेखाचित्र द्वारा समझा जा सकता है।

सूक्त ५१, ५२ सूक्त ५३       सूक्त ७९, ८०

पुराण तत्त्व वडवाग्नि    मन  पुराण तत्त्व दावाग्नि जठराग्नि

मनु ५१., मनवै ५२.,             अमर्त्यस्य ७९., ऋतस्य पथ्यां ८०.

सुमनस्यमानः ५१.,

          मनसा,

          मंसीय ४

          मनु ६

          अपीच्येन मनसा ११

          सुमना ११

          सोम्याः ७

          अमृताय १०

          अमृतत्वम् १०

          जितिम् ११

सौचीक अग्नि के सभी सूक्तों में मन तत्त्व किसी न किसी रूप में समाहित हुआ है। सूक्त ५१-५२ में पुराणतत्त्व है आख्यान है, तथा अग्नि के भौतिक रूप वडवाग्नि का उल्लेख है। और सूक्त ७९-८० में दावाग्नि के साथ जठराग्नि (जो मनुष्यों के भीतर विद्यमान है) का भी वर्णन है। परंतु सर्वत्र उसकी दृष्टि स्थूल से सूक्ष्म की ओर रही है।

(५१, ५२) सूक्तों में मनु है जो देवयुः है व यज्ञकामः है--अर्थात् देव बनने की इच्छा भी उसके भीतर है--अग्निहोत्र करने की इच्छा भी है। (७९-८०) में मर्त्यों के भीतर अमर्त्य को देखा है उसने। स्पष्ट है यज्ञ का मात्र स्थूल रूप उसे स्वीकार्य नहीं तभी वह अग्नि के सूक्ष्म रूपों का दर्शन, अन्वेषण करना चाहता है।

इस सूक्त के प्रथम मंत्र के ऋषि विश्वेदेवाः हैं दिव्यता, दानशीलता व ज्योतिधर्मिता से संबद्ध देव उस अग्नि को खेाजना चाहते हैं जो तिरोहित हो गया था। मनसा इच्छामः, मन से जानने की। अन्वेषण की इच्छा--या जिज्ञासा आध्यात्मिक यात्रा का प्रथम पग है Quest for the Infinite अनंत की जिज्ञासा। अग्निहोत्र स्थूल हो या सूक्ष्म, उसे मन के संपर्ण भावों से करना होता है। मन से मननशीलता से ही तो मनु या मनुष्य होता है--(मानव--अंग्रेजी Man)। अर्थात् मन की मननशीलता से कोई भी कर्म जुड़ जाए तो वह यज्ञ हो जाता है। प्रथम में जो मनु देवयुः था वह यहां इस सूक्त में मनुर् भव मनु होता है साथ ही जनया दैव्यं जनम्--उसका देव में रूपांतरण हो जाता है। प्रकारांतर से कहें तो यहां स्थूल का सूक्ष्म से मिलनकेंद्र है। स्थूल तन के भीतर जब आत्मा या चेतना के स्फुलिंग प्रसारित होते हैं तो अनुभूति होती है स्व-अस्तित्व की। यज्ञ की शब्दावली में कह सकते हैं कि प्रथम, अग्नि समिद्ध होती है, बाद में देवों का आवाहन होता है। जब इंद्रिय-इंद्रिय में चेतना भर जाती है तब जीवन-यज्ञ प्रारंभ होता है। चौथे मंत्र में जो मंसीय क्रिया है वह मन की मननशीलता की ओर संकेत करती है। मन की संपूर्ण कामनाओं और मननशीलता से यदि चाहें तो सौचीक/शौचीक अग्नि (पवित्रकर्तृ आत्मिक चेतना) की अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं। यह पावक अग्नि अमृत है--जल अर्थात् जीवन-प्रवाह के मध्य विद्यमान सर्जनशील ऊर्जा है। संपूर्ण अशुद्धियों को शोधने वाला यह तत्त्व स्वचेतना से जीवनयज्ञ के अंग-प्रत्यंग को परिपूर्ण करता है। इसके अन्वेषण में जब मानवमन की सब दिव्यताएं कुल रूप से लग जाती हैं तब दिव्य जन का आविर्भाव होता है। इस प्रकार इस सूक्त में मनुष्य के द्विज बनने की कथा कही गई है। यह अन्नमयकोष से प्रारंभ होने वाली यात्रा है जिसकी मंजिल है आनंद या अमृतत्व।

इस यात्रा में तन की पुष्टि प्रयांसि अन्न व जल से होती है। (घृत की आहुतियां) स्नेहपूर्ण समर्पण, तथा स्तुतियां--मधुर सुंदर वाणियों उच्चारण--इस जीवनयज्ञ को संपन्न करते चलते हैं। भूत काल की उलझनें या भविष्य की आशंकाएं कुछ नहीं हैं। बस, सब कुछ वर्तमान में अद्य संपन्न हो रहा है--साधु हो रहा है, भद्र हो रहा है। पर कैसे? यज्ञ की रहस्यात्मक वाक् को पा कर। वाक्, वाणी मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता है। उसका संपूर्ण ज्ञान, संपूर्ण कलाएं, संपूर्ण संस्कृति वाक् पर आधारित है। जिह्ना एक ओर षड्रसों  का आस्वादन अर्थात् उपभोग कर तन, मन को पुष्ट करती है, तो दूसरी ओर मंत्रपूत वाणी के उच्चारण से मन--आत्मा का परिष्कार करती है। देवों का प्राप्तिस्थल यज्ञ तथा देवों की पुकार--सब तब साधु भद्र हो जाते हैं। परा, पश्यन्ती मध्यमा व वैखरी रूप है वाणी के। प्रथम वाणी तो गूढ़ ही रहती है--रहस्यमय लोक में रहती है। मन में वाणी का गुह्य रूप छिपा रहता है। वाणी का उच्चारण या वाणी का मनन देवों को शक्ति देता है कि वे असुरों का पराभव कर सकें। असुर आक्रामकता के प्रतीक हैं--आक्रामकता सर्जन नहीं

विध्वंस करती है। मन वचन कर्म तीनों जब एक होते हैं तब सर्जन होता है--जीवनयज्ञ संपन्न होता है--एक ऐसा अग्निहोत्र--जो अग्नि प्रज्वलित कर आहुतियां डाल कर बाहर ही संपन्न नहीं होता मन के भीतर संपन्न होता है। यह अग्निहोत्र मात्र व्यष्टि के लिए नहीं समष्टि के लिए होता है। इससे च जनाः जो ऊर्जाद (अन्न भक्षक) तथा यज्ञिय (पवित्र) हैं लाभान्वित होते हैं। च जनाः को बीस से अधिक व्याख्याएं की जा सकती हैं। चार वर्ण और निषाद निरुक्त-कार ने पचजन में माने हैं। दुर्गाचार्य का मत है कि निषाद को भी यज्ञिय मानना सामाजिक न्याय का प्रतीक है। यज्ञ करने का, यज्ञफल पाने का अधिकार सबको है। निषाद जो पश्रब्ध या आखेट करता है--उसको तो पापमुक्ति के लिए अग्निहोत्र जैसे कर्म और अधिक चाहिए। पंचपरमेश्वर की अवधारणा भी सर्वमाङ्गल्य की सूचक है।

मन के भीतर जब अग्निहोत्र संपन्न हो रहा हो तब सब पापों से रक्षा हो जाती है। धरती व आकाश दोनों के पापों से रक्षण की प्रार्थना एक तरह से मन की मीमांसा है। मन ही तो है हमारे पाप-पुण्य, बंधन-मोक्ष का कारण। मन जब इंद्रिय देवों के अधीन हो जाता है तब कामनाएं असीम हो जाती हैं। अतृप्त कामनाएं अहं को ठेस पहुंचाती हैं। फिर भय, द्वेष जैसे नकारात्मक भाव पैदा होते हैं। यज्ञ कर के, अग्नि अर्थात् संकल्प पैदा कर के--सद्विचार, सद्भावना से हम पापात्मक भावों से बचे रहते हैं। पार्थिव पाप यही हैं--पृथ्वी को दूषित-प्रदूषित करना, पृथ्वी पर रहने वाले अन्य प्राणियों के प्रति दुर्भाव रखना। यदि धरती प्रदूषित है तो दूसरा छोर द्यौ भी प्रभावित होगा ही। या कहें तन से अपकर्म करेंगे तो मन भी प्रभावित होगा। या मन से स्वस्थ चिंतन नहीं होगा तो तन प्रभावित होगा। जीवन यज्ञमय हो जाए तो पचजन लाभांवित होंगे।

दो अत्यंत उद्बोधनात्मक व प्रेरणात्मक मंत्र भी हैं इस सूक्त में। मंत्र में जीवन के तंतु को फैलाते हुए भानु तक पहुंचने की बात है। ज्ञान से उत्पादित ज्योतिष्मान् पथांे की रक्षा कर। उन कर्मपटों को इक सार बुनता चल जिन्हें प्रभु के स्तोता बुनते हैं। तू मनु मननशील बन, दैव्यजन को उत्पन्न कर।

मनु--द्युस्थानी है--निघंटु के अनुसार। मस्तिष्क में जो मनन शक्ति है--जिससे चिंतन, ज्ञान, वाणी का व्यवहार सब नियमित होता है वही मन है। कर्म तंतु का विस्तार तथा प्रज्ञा द्वारा ज्योतिष्मान् पथों की रक्षा होती है। तब कर्मों की उलझनें कुंठाएं बन जाती हैं तब व्यक्ति अंधेरों में डूबने लगता है। रात्रि की आभा का अन्वयन करना ज़रूरी तब हो जाता है। रात्रि अंधकार है पर हर सर्जन से पूर्व अंधकार रहता ही है। उस अंधेरे में से ही ज्योति का (भान या दिन) चमकता है। प्राकृतिक जगत् में तो ऐसा घटता ही है। मानसिक धरातल पर भी यही सब होता है। कर्मपुष्ट प्रज्ञा हो या प्रज्ञापुष्ट कर्म ज्योति उजाले के रास्ते प्रशस्त ही नहीं होते हैं, रक्षित भी रहते हैं।

जीवनयज्ञ का रूपक यहां वर्णित हुआ है तो देवासुर संग्राम का भी उल्लेख हुआ है। इन्हीं संदर्भों में यह सूक्त जीवन-यात्रा का उल्लेख भी करता है। अन्नमय कोष से आनन्दमयकोष तक की यात्रा करनी है तो यात्रा के साधन भी तो चाहिएं। मन-मनु को यात्रा करनी है तो सर्वप्रथम संकल्प को जगाना होगा--(अग्नि समिद्ध करनी होगी)। संकल्प के साथ वाहन चाहिए। अतः रथ (car) का रूपक यहां प्रस्तुत हुआ है। मननशीलता जिस दिव्यता को जन्म देती है वह किन्हें सोमार्ह--सोम का संपादक या अधिकारी बना देती है। सोम-संपादक कभी भी शिथिल या गतिहीन नहीं रहते। वे तो रथ के जुए में अश्वों को जोत देते हैं--उंगलियों से उन्हें (घोड़ों को) सुसज्जित करते हैं या फिर उंगलियों की मुट्ठी बांध लेते हैं; मुट्ठी बांधना दृढता से यात्रा के संकल्प को दोहराना है। रशना उंगली है तो रास भी। घोड़े की रास ढीली हो तो यात्रा शुरू नहीं हो सकती। मन के प्रग्रहोें को कसना पड़ता है। यह रथ अष्टा बन्धुर है। यह विशिष्ट प्रयोग भी विभिन्न अर्थों का वाचक है। अष्ट को अश् (व्याप्ति) धातु से निष्पन्न मान कर अर्थ करें तो जो सर्वत्र मोड़ों वाला है। हर कहीं दुविधा है, मोड़ है--बच-बच कर चलना है।

इसके बाद फिर जीवन-नदिया--संसाररूपी नदिया का बहुत प्रसिद्ध रूपक है अश्मन्वती मंत्र। सौचीक अग्नि का यह मंत्र उनके संपूर्ण रचना कर्म में सुंदरतम मंत्र है। अश्मन मेध है निघंटु में लोक में इसका अर्थ प्रस्तर पाषाण है। निघंटु के अनुसार मेघवती या मेघ प्रसूता जल धाराएं बह रही हैं। अधिकतर भाष्यों में प्रस्तरमयी नदी (story stream) कहा गया है पर रीयते की संगति मेघ प्रसूता से ही अच्छी तरह होती है--नदी उफन रही है; बाधाओं से भरी है (यदि पाषाणमयी अर्थ लेंगे)। जीवनरथ विषयवासनाओं रूपी पत्थरों से भरी अवरोधात्मिका नदी को कैसे पार करे? तो तीन आदेश हैं,

सं रभध्वम्, सावधानाः भवत, सावधान रहो।

उत् तिष्ठत, अद्यमं कुरुत, प्रयत्न करो।

प्र तरत, पारं गच्छत, तैराक बनो, डूबो मत, निराश न होओ।

पहला आदेश मन के लिए--सावधान होना है, सबको साथ ले कर शुरुआत करनी है। सखाओं को समानरूप से उद्यम करना होगा, बल लगाना होगा--रथ को खींचना होगा। (रथ प्रतीक है--धरती पर रथ, नदी में नौका)। उद्देश्य है पार करना। उलझनें केवल नदी के अवरोध रूप प्रस्तर नहीं, या तीव्र वेग ही नहीं हैं, और भी उलझनें है। असुख, अशुभ तो मार्ग में आते ही रहेंगे--क्या इनके भार को लादते चलेंगे रथ पर या नौका पर? तब तो डूब ही जाएंगे। जितना भारहीन हो कर यात्रा (travel light) करेंगे उतना ही अच्छा।

फिर पुरुषार्थ से, उद्यम से, तीव्र इच्छा शक्ति से दुःखमय संसार को भी सुखमय बनाया जा सकता है। मन ही सुख-दुःख का निर्माण करता है। यह बिल्कुल अपने हाथ में है कि हम सकारात्मक पक्ष देखें या नकारात्मक। इस पर भी यदि असुख, अशुभ, या दुर्जन दुःखद आए जीवन में तो श्रेयस्कर यही है कि उसको छोड़ते चलें--संसार नदी के जलों में विसर्जित करते चलें। तो स्वीकार किसे करें? शिवान् वाजान् शुभ पुण्यों, शुभ अन्नों तथा शुभशक्तियों को। क्योंकि वे ही तारक हैं, उनके माध्यम से ही नदी को तैरकर पार कर सकेंगे।

अब यह पार जाना वास्तव में आनंद प्राप्ति है--सोमप्राप्ति है। जो सोमार्ह--सोम के योग्य (सोम्य) देव हैं उन्हीं से यह सब सध पाता है। वेग के विरुद्ध नहीं, वेग के अनुकूल चलते रहना है। ऐसे सोम के अधिकारियों के लिए देवशिल्पी सोमपात्र बनाते हैं। अतिशय शम् गुणों से युक्त श्रेष्ठतम कर्मवाला वह उन्हें सुंदर अयस् से बने परशु से  तराशता है। अन्न-ज्ञान का रक्षक बन कर त्वष्टा सुंदर देवपात्रों को तराशता है। जीवन का पात्र त्वष्टा जैसा वाक् देवता (वाग् वै त्वष्टा) अपनी माया, अपनी प्रज्ञा से, श्रेष्ठतम कार्यशक्तियों (अपसः) से तराश दे तो वे शंतमा बन जाएं ब्रह्मणस्पति एतश है--श्वेतवर्णी कर्मों का स्वामी। एतश अश्व का नाम है। पर अश्व शब्द में भी व्याप्त करने अश्नुते का भाव है।

अमृत अमृतत्वम् जैसे शब्द दशम मंत्र में आए हैं। सोम या अमृत, दोनों आनंद के, शम् या शान्ति के प्रतीक हैं, जो जीवन का चरम लक्ष्य है।

अमृत का पात्र तीक्ष्णधार वाली मेधा से सिरजा जाता है। ज्ञानी या विद्वान् रहस्यों या गुह्यों की खोज करते हैं--जीवन-पात्र को तराशते हैं--परिष्कृत करते हैं। पात्र या पात्रता योग्य या योग्यता ही है। ज्ञान की खोज या अन्वेषण के लिए मन की निष्ठा से जब व्यक्ति चल पड़ता है तथा मननशीलता से उस दिशा में प्रशस्य कर्म करता रहता है तब उसे अपने सभी अशेवों--दुःखों, कष्टों, अंधकारों से मुक्ति मिल जाती है। यही अमृत है जिसमें व्यक्ति मृत मरा-सा नहीं रहता, जीवन या उत्साह से युक्त रहता है। तब उसके मुख से सुंदर वाणियां, स्तुतियां प्रकट होती हैं जो उसके अंतर्मन को उद्घाटित करती हैं। उसके मन के, ज्ञान के अभिप्राय जब शब्दरूप में दूसरों के कानों में पड़ते हैं तो उन्हें भी प्रेरित करते हैं। मन-वचन-कर्म से एक हो जाना--सबका सम्मिलन जीवनयज्ञ में होता है। यही अमृतत्व प्राप्ति है--यही जीवनयज्ञ की सफलता है। यही जीवनयात्रा की मंज़िल है यही जीवनसंघर्ष में जिति है, विजय है। वैदिक ऋषि प्रतीकों में अपनी बात कहते हैं। सौचीक ने अग्नि के प्रतीक को ले कर मानव के मन का विकासक्रम, चिंतन अभिव्यक्ति किया है। इसके साथ ही कर्म या यज्ञ और वाणी भी जुड़ गए हैं तथा सोम, अमृत जैसे प्रिय पदार्थ भी।

तृतीय खंड--नैघण्टुक पद्धति से अर्थ करने की चुनौतियां

वैदिकभाषा लौकिक भाषा से अधिक समृद्ध है यह तो एक तथ्य है ही। एक-एक पद (शब्द) के अनेक पर्याय तभी निघंटु में परिगणित हुए हैं। कोई शब्द लौकिक संस्कृत में जिस अर्थ में प्रचलित हो उसका वही अर्थ वेद में भी हो, यह आवश्यक नहीं। यों भी कुछ वेद के शब्द लौकिक संस्कृत में उन्हीं अर्थों में आज तक प्रचलित हैं जबकि कुछ अर्थ परिवर्तन के दौर से गुज़रे हैं। उदाहरण के लिए लोक प्रसिद्ध पुरोहित शब्द का जो अर्थ आज प्रचलन में है वह अग्नि (ऋग्वेद १..) का विशेषण कैसे संगत होगा ? कई अनुवादकों ने ऐसा किया भी है। ग्रिफिथ उसे priest अनूदित करता है। पर संमुख निहित--संमुख स्थित अर्थ ही सुसंगत लगता है। इसी तरह कई शब्द जैसे, गो मात्र पृथ्वीस्थानी नहीं अपितु अन्य दोनों लोेकों से भी जुड़ा है। इन सभी अर्थों को ले कर चलने से वेदव्याख्या को विस्तार मिलता है। एवं नैघण्टुक (साथ ही निरुक्त भी) प्रक्रिया के अनुसार वेदार्थ प्रक्रिया में निम्न प्रकार से स्पष्टता आती है--

.       सर्वप्रथम वैविध्य आता है। एक ही पद के कई नामों में पठित होने से व्याख्याओं में विविधता आती है बशर्ते हम सब शब्दों को सुसंगत रूप से घटित कर सकें।

.      यह प्रक्रिया कई बार इतना अर्थ विस्तार देती है कि हम मंत्र को गहनता को समझने के समर्थ हो पाते हैं।

.      बचकाने से दिखने वाले या अतार्किक से आख्यान जो अन्यथा पुराण्तत्त्व संवलित लगते हैं--उनके अभिप्राय स्पष्ट हो जाते हैं तथा वे तार्किक लगने लगते हैं।

.      बहुत बार असंगत से प्रतीत होने वाले प्रकरण या वाक्य जिन्हें विद्वान् (विशेषतः पाश्चात्य) obscure कह कर छोड़ देते हैं--उन्हें निघंटु की (निरुक्त की भी) सहायता से सुसंगत रूप में समझा जा सकता है।

इतना सब होते हुए भी भाष्यकरों ने निघंटु का प्रयोग सार्वात्रिक रूप में नहीं किया है। अथवा एक पद के अन्य पर्यायों की उपेक्षा की है। अथवा गो या समुद्र जैसे पदों के अर्थों को मात्र पृथिवीस्थान तक सीमित कर दिया है जबकि ये तीनों स्थानों में परिगण्ति हैं। अतः इस मच के माध्यम से निम्न प्रश्न उठाने का प्रयास किया जा रहा है--

.       क्या निघंटु के अर्थ सर्वत्र संगत हो सकेंगे या करने चाहिएं?

.      प्रायः सभी भाष्यकारों ने सुविधानुसार निघंटु को यूज़ (use) किया है। क्या यह सीमित उपयोग अर्धसत्यों का प्रतिपादन रूपी दुरुपयोग नहीं? क्योंकि जहां उनके मत, उनकी व्याख्या को जंचा वहां उन्होंने निघंटु को अपना लिया, (उसके पर्यायों उसके शब्दों--अर्थों को ले लिया,) पर जहां उन्हें नहीं जंचा वहां लौकिक अर्थों को स्वीकार कर उन्होंने निघंटु की उपेक्षा कर दी।

.      तीसरा प्रश्न जो ऊपर के दोनों प्रश्नों से उभरता है वह यह है कि क्या निघंटु के पर्याय (उसके अर्थ) कण्डीशनल (conditional) हैं--किन्हीं विशेष परिस्थितियों में ही लागू हो सकते हैं या होंगे?

.      यदि हां, तो ऐसा महत्त्वपूर्ण निर्देश निघंटु के व्याख्याकार यास्क को कहीं न कहीं अपनी व्याख्या--निरुक्त में देना चाहिए था। पर जहां तक मेरी जानकारी है वह नहीं मिलता। कैसे यह छूट गया? और इस छूटने को किस रूप में लिया जाए?

इन प्रश्नों, इन चुनौतियों के संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि वेद का शोधार्थी इन सब पर्यायों का उपयोग करने में समर्थ नहीं हो पाता क्योंकि वैदिक वाङ्मय के उसके अध्ययन की सीमाएं होती हैं। पर यदि खुले मन से संपूर्ण वैदिक साहित्य का आश्रय ले कर निघंटु पदत्त पर्यायों का प्रयोग किया जाए तो वेदव्याख्या पद्धति के नवीन आयाम विकसित होने में कोई संदेह नहीं रहेगा।

ऋग्वेद १०.५३ के मंत्रों के कुछ शब्दों का उल्लेख करना यहां अनावश्यक न होगा--

.       प्रयांसि: द्वितीय मंत्र में प्रयुक्त इस पद का अर्थ अधिकतर भाष्यकारों (स्कंद स्वामी, वेंकट माधव सायण) ने हवि या हव्य पदार्थ कर के उसे कर्म कांड तक सीमित कर दिया है जबकि निघंटु में ये उदक और अन्न हैं--अन्न-जल जो जीवन के लिए आवश्यक पदार्थ हैं, ऊर्जा के स्रोत हैं।

.      गोजाता: पांचवे मंत्र में प्रयुक्त इस शब्द का अर्थ पृथ्वी पर उत्पन्न प्राणी ही सबने किया है। परंतु निघंटु में गौ के पांच अर्थ हैं पृथिवी, द्यु, आदित्य, वाक् तथा स्तोता। फिर पृथिवी वहां अंतरिक्ष है भूमि नहीं। हां, पृथ्वी ज़मीन हो सकती है। इन पांच अर्थों से आत्मा की पांच स्थितियां गिना कर मंत्र का गहन मनन किया जा सकता है। पृथ्वी से उत्पन्न शरीर, द्यौ से उत्पन्न मन, आदित्य से उत्पन्न संस्कारमयी स्थिति, वाणी से उत्पन्न आत्मा की आवाज़, स्तोतृ-जात-सतत आत्मस्मरण।

.      रजस्: छठे मंत्र में आए इस शब्द का सभी ने अर्थ किया है, लोक (region) पर भानुः के साथ संगति बैठानी हो तो निघंटु के अर्थ रात्रि को लेना होगा क्योंकि भानु वहां दिन है।

.      मनु: छठे मंत्र में पठित मनुः का भाष्यकारों ने मननशील अर्थ दिया है पर प्रश्न है कि मनुः द्युस्थानी है निघंटु में। अब मानव शरीर की बात करें तो द्युस्थानी मन ही है। इसे अन्यथा द्युस्थान में घटित करना मुझे तो चुनौती लगता है।

.      अष्टावन्धुरम्: भी एक चुनौतीपूर्ण पद है। सायण ने इसे (आदित्य--) रथम् का विशेषण माना है। पर अष्टा को निर्वचनपरक अर्थ (व्यापनार्थ वाली अश् से निष्पन्न) मान कर ही सरलता रहती है।

       त्वष्टा: नवें मंत्र में त्वष्टा--मध्यमस्थानी तथा द्युस्थानी दोनांे माना गया है निघंटु में। त्वष्टा देव की अन्य विशेषताएं जो भी हों, पात्र निर्माण कला से उसे जोड़ा गया है। पात्र तराशना प्रतीकात्मक है--जीवन के परिष्कार की--मन के परिष्कार की बात तो ठीक है उसे द्यु--मन से संगत कर सकते हैं पर मध्यस्थानी--रूप में कैसे संगति होगी? यदि उसके परशु=वज्र (निघंटु) की बात करें तो फिर वज्र--भी मध्यमस्थानी होगा--तब पूरे मंत्र के अर्थ में संगति बैठाना कठिन है, शोधार्थी के लिए।

.       अमृताय: १०वें मंत्र में भाष्यकारों ने अमृत को या तो सोम रूप में ग्रहण किया है अथवा बाद के पौराणिक अर्थ में। उपनिषद् में अमृत-अमृतत्व मोक्ष के अर्थ में लिए गए हैं। निघंटु में अमृत के हिरण्य और उदक अर्थ हैं। पूरे मंत्र में हिरण्य अर्थ की संगति स्वर्णरूप में लगाना कठिन है। केवल अभीष्ट पदार्थ मान कर उसे स्वीकर किया जा सकता है। उदक तो जीवन का वाचक है ही। फिर यहां पर प्रतीक रूप में ही अमृत के दोनों रूपों को स्वीकार करना होगा।

 First published : 30-4-2008 AD(Vaishaakha krishna navamee, Vikrama samvat 2065

This page was last updated on 12/06/10