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CONTRIBUTION OF FATAH SINGH 

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Veda Study

 

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Wadhva on Fatah Singh

Introduction

Rigveda 6.47.15

Atharva 6.94

Aapah in Atharvaveda

Single - multiple waters

Polluted waters

Indu

Kabandha

Barhi

Trita

naukaa

nabha

Sindhu

Indra

Vapu

Sukham

Eem

Ahi

Vaama

Satya

Salila

Pavitra

Swah

Udaka

 

Symbolism of Water in Veda

(A thesis submitted by Dr. Sukarma Pal Singh Tomar to Chaudhary Chanran Singh University, Meerut)

This is a strange fact that the word aapah/waters is used as a plural form in vedic and classical texts alike. In grammer also, this word does not have single or dual number forms. The reason for this is that aapah is symbolic of life forces, the praanas, and the praanaas are many. Though there are different names for different types of praanas, but no praana exists independently, it dependent on the others. Still, vedic texts have indicated a common origin of all these praanaas, and this origin has been called ‘Salilam’. This salilam has also sometimes been called ‘mahat’. The plural form of salilam is called aapah, the waters. Manifestation after trance takes place through these aapah. This salilam has the property that just like praanaas can contract and expand, in the same way, salilam can contract the manifestation into a single entity or it can expand a single entity into many. When this salilam is devoid of contraction and expansion, then no manifestation can take place, it is the state of akshara, no seepage. This may be nothing but the Om brahma. This can be called the formless form of lord Shiva. Aapah exist there as the power of this formless lord Shiva. These aapah take part in manifestation, or they are responsible for manifestation. And it is well known that manifestation takes place due to power, the consort of lord Shiva, which has been called Vaak or voice in vedic literature. This indicates that aapah can be nothing but vaak. But there may be one difference between aapah and vaak. Vaak may be highest level of aapah or praanas. 

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First published on internet: 6-3-2008( Faalguna amaavaasyaa, Vikrama samvat 2064)

आपः का एकत्व और अनेकत्व

वेद मे उदक का प्रतीकवाद

(शोध प्रबन्ध)

- डा. सुकर्म पाल सिंह तोमर

आपः शब्द की सबसे बडी विशेषता यह है कि यह शब्द लौकिक संस्कृत में वेद के समान ही सर्वत्र बहुवचन में ही प्रयुक्त है व्याकरण में भी, अन्य शब्दों के समान इस शब्द के एकवचन और द्विवचन रूप नहीं मिलते इसका कारण यह है कि वेद में आपः प्राणों के प्रतीक रूप में प्रयुक्त हैं और प्राण नानारूपात्मक ही हैं । जो प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान नाम सुने जाते हैं, उनमें से कोई भी अकेला नहीं, सब एक दूसरे पर आश्रित होने से, उनमें से किसी का भी स्वतन्त्र एकत्व नहीं है फिर भी, वेद ने उन प्राणों के एकत्वपरक उद्गम की ओर संकेत किया है ब्राह्मण ग्रन्थ कहते हैं कि प्राणरूप आपः की धाराएं आदि में 'सलिल' थी ( आपो वा इदमग्रे सलिलमासीत् - तैत्तिरीय ब्राह्मण ...) सलिल को ही कभी - कभी महत् भी कहा गया है ( जैमिनीय ब्राह्मण .१८?) अतएव निघण्टु में उदकनामों में आपः के साथ 'सलिल' तथा 'महत्' को भी सम्मिलित कर लिया गया सलिलं के ही रूपान्तरों 'सलिलानि' को आपः कहा जाता है, जिनमें समुद्र ज्येष्ठ है, परन्तु इस कथन द्वारा वेद जिन आपः की ओर संकेत कर रहा है, वे सामान्य सलिल/जल के रूपान्तर नहीं हैं, अपितु 'प्राणा वा आपः' द्वारा संकेतित 'आपः देवी:' हैं जिन्हें वज्री इन्द्र ने अनेकत्व प्रदान किया है -

समुद्रज्येष्ठा: सलिलस्य मध्यात् पुनाना यन्त्यनिविशमाना: इन्द्रो या वज्री वृषभो रराद ता आपो देवीरिह मामवन्तु ।। या आपो दिव्या उत वा स्रवन्ति खनित्रिमा उत वा या: स्वयंजा: समुद्रार्था या: शुचयः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु ।। - ऋग्वेद .४९.-

          जिस सलिल के मध्य से ये अनेक धाराएं चली रही हैं, वह वस्तुतः इन्द्र का ही 'महत्' नामक गुह्य नाम है जो अनेकत्व भी ग्रहण कर सकता है ( महत्तन्नाम गुह्यं पुरुस्पृक् - . १०.५५.) डा. फतहसिंह की पुस्तक 'वैदिक दर्शन' में महत्(सलिलं) के आधार पर ही सांख्य दर्शन के 'महत्' को कल्पित माना गया है इस महत् से उद्भूत अहंकार, मन तथा पंच ज्ञानेन्द्रियों को मिलाकर अथर्ववेद ने जिस 'अष्टाचक्र' सृष्टिचक्र की कल्पना की है, वह वस्तुतः 'देवी: आपः' नामक प्राणों का ही सृष्टिचक्र है -

अष्टाचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पश्चा अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं कतम: केतु: ।। - अथर्व ११..२२

इस मन्त्र में निम्नलिखित बिन्दु विशेष रूप से ध्यातव्य हैं -

. अष्टाचक्र 'सहस्राक्षर' है इसका अभिप्राय है कि इसी अष्टविध सृष्टिचक्र के द्वारा नाना प्रकार की इच्छाओं, भावनाओं, विचारों, क्रियाओं आदि की सृष्टि होती है यही सहस्राक्षरा वाक् की सृष्टि 'सलिलानि ' कही गई है जो अपने मूल पद सहित उक्त अष्टचक्रों को जोडकर नवपदी होती कही जाती है इस सहस्राक्षरा वाक् के जो अनेक समुद्र हैं, उनके विविधरूपेण क्षरण करने के कारण चारों दिशाओं को जीवन मिलता है और इन समुद्रों के माध्यम से ही वह क्षरणरहित मूलभूत अक्षरपद भी क्षरण करता है जिसके सहारे विश्व जीवन धारण करता है -

तस्या समुद्रा अधि विक्षरन्ति तेन जीवन्ति प्रदिशः चतस्र: ततः क्षरत्यक्षरं तद् विश्वमुपजीवति ।। - . .१६४.४२

. अष्टाचक्र को एकनेमि कहा गया है क्योंकि यह चक्र जिन उक्त अष्टप्राणों की संहति का प्रतीक है, वह उक्त एकपदी वाक् की परिधि के अन्तर्गत है इसी वाक् को 'प्राणानामुत्तमा' ज्योति कहा जाता है( प्राणानां वाग् उत्तमा - तैत्तिरीय संहिता ..., ..११.)

. यह अष्टाचक्र पुरस्तात् और पश्चात् गति करने वाला है, क्योंकि यह वस्तुतः प्राणचक्र है और प्राण को समञ्चन और प्रसारण नामक द्विविध गति वाला बताया गया है ( प्राणो वै समञ्चन प्रसारणं यस्मिन्नङ्गे प्राणो भवति तत् सं अञ्चति प्र सारयति - माध्यन्धिन शतपथ ब्राह्मण ...१०) इसी द्विविध गति को प्राणरूप हंस के दो पाद माना गया है जिनमें से एक सदा ही सलिल(महत्) से सम्बद्ध रहता है अर्थात् या तो सलिलं फैले हुए नानात्व का समञ्चन एकत्व में करता है या एकत्व को पुनः नानात्व में प्रसारित करता है इन दोनों पादों को उठा लेने का अर्थ होगा कि अद्य, श्व, अहोरात्र तथा उषा काल के रूपक द्वारा वर्णित नानात्व सृष्टि का सर्वथा अभाव, जिसके फलस्वरूप यह हंस पूर्वोक्त उस अक्षर में परिणत हो जाएगा जो नानारूपात्मक सृष्टि रूपी क्षरण से सर्वथा रहित है -

एकं पादं नोत्खिदति सलिलाद् हंस उच्चरन् यदङ्ग समुत्खिदेत् नैवाद्य श्व: स्यान्न रात्री नाहः स्यान्न व्युच्छेत् कदाचन ।। - अथर्व ११..२१

. विश्वभुवन के नानात्व की सृष्टि करने वाला उक्त चक्र वस्तुतः किसी मूलभूत तत्त्व का अर्धभाग ही है, परन्तु अवशिष्ट अर्धभाग एक अज्ञात रहस्य है इस रहस्य का उद्घाटन यहां प्रथम बिन्दु की व्याख्या में उल्लिखि वह सत्य 'अक्षर'(क्षरणरहित) करता है जो उक्त 'अष्टाचक्र एकनेमि' के माध्यम से क्षरण करता है डा. फतहसिंह के अनुसार यह 'अक्षर' वह ब्रह्म है जिसे वेदान्त में निर्गुण ब्रह्म तथा आगमों में परम शिव कहा गया है यह शक्तिमान शिव का वह रूप है जिसमें उसकी शक्ति लीन रहती है इस अक्षर के क्षरण होने का अर्थ है - उसमें प्रतिष्ठित आपः रूप उसकी शक्ति का नानारूपात्मिका होकर सृष्टि करना शक्ति शिव की अर्धाङ्गिनी है और इसी दृष्टि से वह अर्धनारीश्वर है यह कहने की आवश्यकता नहीं कि यह शक्ति ही वह वाक् है जिसे यहां प्राणानाम् उत्तमा ज्योति: कहा जा चुका है

प्राणरूप आपः की सृष्टि और काष्ठाएं

          वाक् से होने वाली सृष्टि को प्राणरूप आपः की सृष्टि कह सकते हैं । सामान्यतः इस सृष्टि को व्यष्टिगत सृष्टि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसमें सक्रिय भूमिका सप्त आपः की रहती है इस बात को यजुर्वेद में निम्नलिखित मन्त्र में प्रस्तुत किया गया है -

सप्त ऋषय: प्रतिहिता: शरीरे सप्त रक्षन्ति सदमप्रमादम् सप्तापः स्वपतो लोकमीयुस्तद्वा जागृतोªस्वप्नजौ सत्रसदौ देवौ ।। - यजुर्वेद ३४.५५

इस मन्त्र में सप्त प्राण रूपी ऋषियों को तीन प्रकार से बताया गया है -

. शरीर में स्थित सात स्थoलप्राण - दो चक्षु, दो श्रोत्र, दो नासिकारन्ध और एक मुख

. अप्रमाद भाव से निरन्तर रक्षा करने वाले सात सूक्ष्म प्राण अर्थात् अहंकार, मन और पांच ज्ञानेन्द्रियां

. सुषुप्तिलोक में व्याप्त रहने वाले आपः नामक अति सूक्ष्म प्राण इन आपः को सप्त आपः कहने के साथ ही इनके साथ महती(. ..२२) और मही( . .५७.) विशेषण भी प्रयुक्त हैं । आपः को सप्त, महती, मही कहने का क्या रहस्य है, उसका एक संकेत तो पूर्वोक्त यजुर्वेदीय मन्त्र से मिल गया है, परन्तु प्रतीकवादी आवरण को हटाकर इसे जिस प्रकार प्रस्तुत किया गया है, उसके लिए हम ठोपनिषद के निम्न उद्धरण की सहायता ले सकते हैं -

इन्द्रियेभ्य: परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः मनसस्तु परा बुद्धि बुद्धेरात्मा महान् पर: ।।

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुष पर: पुरुषान् पर: किंचित् सा काष्ठा सा परा गति ।। - कठोपनिषद ..१०

यहां आत्मा के व्यक्त और अव्यक्त स्तरों को काष्ठा कहा गया है यह शब्द ऋग्वेद में प्रयुक्त हुआ है - अतिष्ठन्तीनामनिवेशनानां काष्ठानां मध्ये निहितं शरीरम् वृत्रस्य निण्यं विचरन्त्यापो दीर्घं तम आशयद् इन्द्रशत्रु: ।। - . .३२.१०    कठोपनिषद में पराकाष्ठा का नाम पुरुष बताया गया है इसी को ऋग्वेद ने अजन्मा, असृष्टा, असु आत्मा माना है ( भूम्या असुरसृगात्मा - . .१६४.) यह अजन्मा से जायमान होने में स्थिति( अगतिमय प्रकृति ) को त्यागकर विकृति को ग्रहण करता है मूल प्रकृति उसकी अव्यक्त रहने की स्थिति है अतः यहां पुरुष और अव्यक्त नाम से जो सांख्यमत के समान दो अलग - अलग सी काष्ठाएं लगती हैं, वे वस्तुतः एक ही काष्ठा के अन्तर्गत शक्तिमान(आत्मा) और उसकी शक्ति(प्रकृति ) की अद्वैत और अव्यक्त इकाई को ही सूचित करती हैं । इस अद्वैत इकाई में निहित शक्ति का जब स्फुरण होता है, तभी अव्यक्त का व्यक्तीकरण आरम्भ होता है अथवा, वेद के शब्दों में, अजन्मा जायमान होता है सांख्य दर्शन की शब्दावली में, तभी प्रकृति /अव्यक्त में क्षोभ होता है और उसके फलस्वरूप महत् नामक बुद्धि उत्पन्न होती है इसी व्यक्तीकरण के स्तर को कठोपनिषद ने आत्मा महान् कहा है यह स्तर अव्यक्त स्तर से इस बात में भिन्न है कि पहले जो शक्ति आत्मा में अन्तर्निहित थी, वह अब स्फुरित होकर बृहदारण्यक उपनिषद की भाषा में, अन्यदिव हो गई ( बृ.. ...३१) इसी का नाम महत् है इससे युक्त होने के कारण अव्यक्त काष्ठा का पुरुष अब महत् के योग से अगली काष्ठा में आत्मा महान् कहा जाता है पुरुष की अव्यक्त मूल प्रकृति की पहली विकृति यह महत् है जो बुद्धि, मन और अर्थ नामक अन्य विकृतियों में रूपान्तरित होती है ये सभी मनुष्य की सूक्ष्मस्तरीय व्यक्तित्व की काष्ठाएं हैं ।

          इनमें से बुद्धि को अहंबुद्धि कह सकते हैं जो महत् नामक बुद्धि से भिन्न है महत् अहंपूर्व बुद्धि है जिससे युक्त होने से पुरुष की महान् संज्ञा होती है और उसे बुद्धि (अहं बुद्धि) से परे बताया जाता है अहंबुद्धि से मन और मन से अर्थ उत्पन्न होते हैं । अर्थ से तात्पर्य मन से उद्भूत उन शक्तियों से है जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक पांच तत्त्वों को ग्रहण करती हैं । इन पांचाx अर्थों के साथ मन और अहंबुद्धि मिलाने से सात काष्ठाएं बनती हैं । ये प्रथम विकृति, महत् की विकृतियां हैं । ये ही महान् आत्मा और महत्(अहंपूर्व बुद्धि) के सात पुत्र हैं जिन्हें नारा: वा नरसूनव: कहा जा सकता है - - - -

          प्रत्येक स्तर के इन सात प्राणों का उद्भव जिस अष्टम प्राण से होता है, उसी को सांख्य दर्शन में अष्टमी प्रकृति अथवा महत् कहा जाता है । वेद में आपः के साथ महत् शब्द का प्रयोग इस दृष्टि से विचारणीय है, क्योंकि महत् शब्द कठोपनिषद के उक्त उद्धरण में नीचे की काष्ठाओं का स्रोत है महती: ( ऋग्वेद ..२२) या मही:( . .५७.) विशेषणों का प्रयोग आपः के साथ इसलिए सार्थक लगता है कि स्वयं महत् शब्द वेद में वही अर्थ रखता प्रतीत होता है अव्यक्त आत्मा की जिस प्रकार प्रथम अभिव्यक्ति महत् है, उसी प्रकार महत् इन्द्र का प्रथम वीर्य है महत् वह नाम भी है जहां सभी देव इन्द्र में समाहित हो जाते हैं और संभवतः इसीलिए वह देवों का एकमात्र अक्षर असुरत्व है जो रहस्यपूर्ण गोपद में जन्मता है - - - महत् को इन्द्र का वह गुह्य नाम बताया जाता है जो भूत और भव्य सभी का जन्मदाता है ( . .५५.) इन्द्र का यह महत् जिस महती की उपज है, वह प्रथमा उषा है जो अन्यत्र सत्या कहाती है ( . १०.५५.) यह महती सांख्य की उस अव्यक्त प्रकृति के समान है जिससे प्रादुर्भूत होकर महत् बुद्धि अहंकार, मन तथा अन्य सभी तत्त्वों को जन्म देती है

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