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CONTRIBUTION OF FATAH SINGH 

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Veda Study

 

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Wadhva on Fatah Singh

Introduction

Rigveda 6.47.15

Atharva 6.94

Aapah in Atharvaveda

Single - multiple waters

Polluted waters

Indu

Kabandha

Barhi

Trita

naukaa

nabha

Sindhu

Indra

Vapu

Sukham

Eem

Ahi

Vaama

Satya

Salila

Pavitra

Swah

Udaka

 

Symbolism of Waters in Veda

-         Sukarma Pal Singh Tomar

(A thesis accepted by Chaudhary Charan Singh University, Meerut, 1995)

Ekata, Dvita and Trita

Ekata, Dvita and Trita happen to be seers of hymns of vedas. In order to understand Ekata, Dvita and Trita, it is necessary to understand the concept of past, present and future in veda. These words further involve in themselves two words – vishwa and sarva. Both of these are translated as having the same meaning – the whole world. Sarva is concerned with future. It involves in itself active life forces. But it is under control of a demon. It’s advantage can be gained only by freeing it from the demon. This can be done by penances. On the other hand, vishwa is connected with past. It involves those life forces which penetrate inside. Ekata is symbolized by ‘sarva’, while Trita is symbolized by ‘vishwa’. In between the two comes the word ‘bhuwanam’ which involves both past and present, or sarva and vishwa. Dvita is connected with this bhuwanam.

      These three have been stated to have born out of waters/life forces. Ekata is born of waters of the nature of sarva. Dvita from the waters have nature of both savra and vishwa. Trita is born of waters having nature of vishwa. Trita is the highest state out of three, where the duality involved in Ekata vanishes. But in normal life, this Trita happen to be lying in a dark well, swallowed by a dark nature serpant. This serpent may be our ego.  It is necessary to free Trita from these vices. When Trita is able to overcome these demonical forces, he is able to handle all the past, present and future. The story says that all the wealth of Trita has been usurped by Ekata and Dvita. It means that when Trita is lying in the dark well, his wealth can be usurped either by Dvita(present) who is worried about both past and future, or by Ekata who has eye only on future. Therefore, Trita, who is supposed to foresee past, present and future, is lying in a dark well. And the reason for this state of Trita is that he accepted the demand of Ekata and Dvita to quench their thirst and fall in the well. This individuality itself is called Trita.

 

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First published on internet : 12-3-2008AD( Faalguna shukla chaturthee, Vikrama samvat 2064)

वेद में उदक का प्रतीकवाद

- सुकर्मपाल सिंह तोमर

(चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय द्वारा १९९५ में स्वीकृत शोध प्रबन्ध )

एकत, द्वित और त्रित को समझने से पूर्व भुवनं, भूतं और भविष्यत् शब्दों को समझ लेना उपयुक्त होगा इनमें से 'भुवनं' शब्द प्रायः 'विश्वं' शब्द के साथ प्रयुक्त हुआ है( ऋग्वेद .२७.), जबकि 'भविष्यत् ' तथा 'भूतं' के साथ 'विश्वं' का प्रयोग कहीं नहीं हुआ है भाव विकार परक 'भुवनं' का सम्बन्ध 'विश्व' और 'सर्व' दोनों से है, जबकि भूतं और भविष्यत् में से प्रथम (भूतं) अस्ति - भवति के द्वन्द्व से परे है, और भविष्यत् केवल 'भू' धातु से संकेतित परिवर्तनशील सत्ता का सूचक होने से सृ धातु से निष्पन्न सार्थक सर्व ही है भूतं वह प्राण है जिसका पालक : प्रजापति अथवा हिरण्यगर्भ नामक प्राणोदक है और जिसकी छायास्वरूप मृत्यु और अमृत का द्वन्द्व ( . १०.१२१.-) माना गया है इसका तात्पर्य है कि 'भूतं' नामक प्राणोदक 'भवति' और 'अस्ति' के सापेक्ष - द्वन्द्व से परे है इसके विपरीत, 'सर्वम्' गतिशील प्राण का बोधक है अतः 'सर्वं ' अपने में वृजिन तथा साधु के द्वन्द्व को समेटे हुए कहा गया है, जबकि द्वन्द्वातीत अवस्था को 'परमा' कहा गया है ( ऋग्वेद .२७.) द्वन्द्व के कारण 'सर्वम्' परिक्रोश रूप है जिसका त्याग अथवा विनाश वाञ्छनीय है ( . .२९.) 'सर्वं ' पणि का वह 'भोजन' है जो भावरूप अश्व और ज्ञानरूप गौ से युक्त एक 'पश्यक' होने से पशु कहलाता है, परन्तु उसे पणि नामक असुर के चंगुल से छुडाकर ही सम्यक् रूपेण प्राप्त किया जा सकता है ( ऋग्वेद .८३.) द्वन्द्वातीत ज्ञानस्वरूप जातवेदस् अग्नि मर्त्यों के 'सर्व' को 'अमृतं' बना सकता है, क्योंकि वह प्रवेशार्थक विश धातु से निष्पन्न 'विश्व' संज्ञा वाली सत्ता है जो भीतर ही भीतर प्रविष्ट होने वाला पूर्वोक्त 'भूतं' संज्ञक प्राणोदक है

त्रित, द्वित और एकत

 आपः नामक प्राणोदक से उद्भूत तीन आप्त्यों में से अन्यतम को त्रित नाम दिया गया है जिसमें उक्त 'सर्व' नामक प्राणोदक का समस्त द्वन्द्वात्मक 'दु:स्वप्न्यं' समाप्त हो जाता है ( . .४७.१५) त्रित से भिन्न 'एकत' भविष्यत् 'सर्व' का द्योतक है( यजुर्वेद ३४., अथर्व .११. इत्यादि ) द्वित उस 'भुवनं' का सूचक है जो उक्त 'विश्वं' तथा 'सर्वं' दोने से सम्बन्ध रखने वाले वर्तमान प्राणोदक का प्रतीक है

मनुष्य सामान्यतः वर्तमान(विश्वं भुवनं ) के अन्धकार में छिपा हुआ अर्थात् दीर्घं तम: रूप अहि द्वारा निला हुआ होता है जिसे पूर्वोक्त 'स्व:' रूप में आविर्भूत करना परमावश्यक है ( ऋग्वेद १०.८८.) अन्धकार - निलित 'विश्वं भुवनं ' ही ऋग्वेद .१०५ में 'कूपस्थित ' त्रित के रूप में कल्पित हुआ है अन्धकारमय कूप से वह तभी बाहर निकलता है जब वह वृत्र का वध करने में समर्थ होता है वृत्रवध की यह सामर्थ्य ही वह दक्षिणा( दक्षता) है जो साधक को केवल 'विश्वं भुवनं' को ईम् ( व्यक्त प्राणोदक) के वर्तमान रूप में प्रदान करती है, अपितु उस स्व: नामक प्राणोदक को भी जो 'भविष्यत् ' है ( ऋग्वेद १०.१०७.) इस प्रकार वृत्रवध की सामर्थ्य होने पर जो त्रिकाल स्थित त्रित अन्धकार रूप कूप में था, वह प्रकट होकर भूतं, भुवनं( वर्तमान ) तथा भविष्यत् तीनों को संभालने में समर्थ हो जाता है ये ही वे 'भुवनानि ' हैं जिनको देखता हुआ सविता हिरण्ययकोशीय ज्योvति रूप रथ द्वारा आता हुआ, मर्त्य और अमृत नामक दोनों स्तरों को निवेशित करता हुआ, कर्षण - रहित 'रज:' द्वारा वर्तमान होता है ( . .३५.) मानव जीवन के त्रिकाल का यह आदर्श सुविकसित रूप है जिसकी प्राप्ति त्रित जीवात्मा को उक्त दीर्घं तम: रूप कूप से बाहर आने पर होती है

त्रित का रहस्य

          इस प्रकार त्रित के पूर्वोक्त आख्यान का रहस्य और अधिक स्पष्ट होता है तदनुसार अहंकार रूप अहि के प्रभाव में पडा हुआ प्राण( आत्मा) का त्रित रूप वह 'विश्वं भुवनं' है जो अपने भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीनों रूपों को संभालने में असमर्थ है क्योंकि उसकी सारी आध्यात्मिक शक्ति या तो 'विश्वं' (भूतं) और 'सर्वं' (भविष्यत्) के द्वन्द्व की चिन्ता करने वाले द्वित 'भुवनं' ( वर्तमान ) ने ली है, अथवा एकमात्र 'सर्वम् ' (भविष्यत् ) पर दृष्टि रखने वाले एकत ने हथिया ली है जिसके परिणामस्वरूप त्रित अपने त्रिकालात्मक सनातन स्वरूप को भूलकर अज्ञानान्धकार रूपी कूप में पडा हुआ है ऐसी स्थिति में एकत नामक आप्त्य अन्नमय कोश का सूचक हो जाता है जिसे अपने को भविष्य(सर्वं ) में सुरक्षित रखने की चिन्ता रह जाती है और द्वित आप्त्य उस प्राणमय 'सर्वं ' का द्योतक हो जाता है जो प्राणन और अपानन क्रिया के द्वारा विश्वं और सर्वं दोनों के लिए चिन्तित रहता है, जबकि त्रित आप्त्य उस मनोमय आत्मा की ओर संकेत करता है जो अपने त्रिकालातीत सनातन स्वरूप के हिरण्यनेमयः विद्युतः की यदाकदा झलक भले ही पा लेता हो, परन्तु उसके आपश्चन्द्रा: अथवा हिरण्यवर्णाः आपः से सर्वथा अपरिचित हो जाता है, जो उसके सनातन स्वरूप की विशेषता है त्रित आप्त्य को इस अन्धकारमय कूप में गिराने वाले, उक्त वर्तमान और भविष्यत् पर ही दृष्टि रखने वाले क्रमशः द्वित और एकत नामक उसी के भाई हैं उन्होंने उस मनोमय आत्मा रूप त्रित को अहंकार जनित अन्धकार के कूप में ढकेला है त्रित आप्त्य की इस दुर्दशा का कारण यह है कि उसने प्राणमय द्वित और अन्नमय एकत की प्यास बुझाने के लिए उस कूप में गिरना स्वीकार कर लिया और इस बात को सर्वथा भुला दिया कि उसका वास्तविक स्वरूप त्रिकालात्मक सनातन है , जो स्व:, स्वस्ति तथा हिरण्ययी ज्योvति से आलोकित रहता है

पूर्ण की उपलब्धि

          त्रित, द्वित और एकत का उस समय कायापला हो जाता है जब दीर्घंतम: कहलाने वाले अहंकार रूपी वृत्र का अन्त हो जाता है और त्रित की अन्धकार के कूप से बाहर निकलने की वह प्रार्थना स्वीकृत हो जाती है जिसे वह ऋग्वेद .१०५ में बडे करुण स्वर से विलाप करता हुआ कर रहा था उस सूक्त के प्रत्येक मन्त्र की टेक 'वित्तं मे अस्य रोदसी ' है इसका अर्थ है कि हे रोदसी, मेरी इस अवस्था को जानो रोदसी द्यावापृथिवी नामक उस चेतनायुग्म का नाम है जिसने प्रजापति को रुलाया था( तैत्तिरीय ब्राह्मण ...) , क्योंकि अहंकार रूप अहि से आक्रान्त होने पर रोदसी की रुलाने वाली अवस्था हो जाती है त्रित रोदसी से अपनी दशा को जानने के लिए इसीलिए कहता है, क्योंकि रोदसी ही वस्तुतः उसको भी रुलाने के लिए उत्तरदायी है

          उसकी इस प्रार्थना को बृहस्पति सुन लेता है ( तच्छुश्राव बृहस्पति: - . .१०५.१७) बृहती

बृहती नामक उदार बुद्धि का स्वामी होने से वह बृहस्पति कहलाता है बृहस्पति द्वारा प्रार्थना सुने जाने का संकेत यह है कि अब उस अहंकार जन्य संकीर्णता और क्षुद्रता का अन्त होना संभव है, क्योंकि बृहती बुद्धि का स्वामी अब उसका पक्षधर होने वाला है ऋग्वेद .४७ में त्रित पुनः सभी आदित्यों से निवेदन करता हुआ उनकी निष्पाप ऊतियों(रक्षणोपायों) की कामना करता हुआ प्रत्येक मन्त्र में 'अनेहसा ऊतयः सुऊतयो ऊतयः ' की टेक दोहराता है और अन्त में अपने समस्त दु:ष्वप्नों (दु:ष्वप्न्यं सर्वं ) से मुक्त होने के लिए उषा देवी से निवेदन करता है ( ऋग्वेद .४७.१६ - १८) इन सब प्रार्थनाओं के फलस्वरूप त्रित को जो उपलब्धि होती है, उसकी झलक हमें उसके उन सूक्तों से मिलती है जो ऋग्वेद के नवें(ऋग्वेद .३३-३४) और दशम(ऋग्वेद १०.-) मण्डल में प्राप्य हैं नवम मण्डल में उसे उस इन्दु(सोम) के पवमान रूप की प्राप्ति होती है जिसका उल्लेख हमें निघण्टु के उदकनामों में भी मिलता है पूर्व प्रार्थना से त्रित के जो 'वन' नामक प्राणोदक उभरे थे, उनकी ओर ज्ञानमय सोम बिन्दुओं( सोमासो विपश्चितः ) की ऊर्मियां आने लगती हैं( ऋग्वेद .३३.) ऋत धारा के साथ शुक्र और बभ्रु सोमलहरियां वाज नामक बल का क्षरण करने लगती हैं तथा इन्द्र, वरुण, विष्णु और मरुतों के लिए सोम प्रवाहित होने लगता है ( ऋग्वेद .३३.-) इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति नामक 'तिस्रो वाच: ' ऊपर उठनेv लगती है और वे 'ऋतस्य मातर: ' होकर सोम नाम दिव्य शिशु का परिमार्जन करने लगती हैं ( ऋग्वेद .३३.) , परन्तु फिर भी त्रित सहस्री सोम(सहस्रार चक्र से प्राप्त होने वाले आनन्द रस) से प्रार्थना करता है कि वह हमारे लिए भीतर से(विश्वतः ) चार समुद्रों(विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, अन्नमय कोशों) को भरने के लिए क्षरित हो

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This page was last updated on 07/24/10.