Make your own free website on Tripod.com

CONTRIBUTION OF FATAH SINGH 

TO

Veda Study

 

Home

Wadhva on Fatah Singh

Introduction

Rigveda 6.47.15

Atharva 6.94

Aapah in Atharvaveda

Single - multiple waters

Polluted waters

Indu

Kabandha

Barhi

Trita

naukaa

nabha

Sindhu

Indra

Vapu

Sukham

Eem

Ahi

Vaama

Satya

Salila

Pavitra

Swah

Udaka

 

Not all waters/life forces are divine in vedas. One type of waters have been called eternal waters and such type of waters carry poison with them. At the earlier stage, when egoistic mind has not developed, these waters remain pure. But as soon as the egoistic mind develops, these waters become impure. These waters are nothing but our states of mind. And these waters are called eternal because this is a natural state .  In order to purify them, it is necessary that arrangements be made so that Indra can take birth in life, who can destroy evil forces with his thunderbolt. As an example of these eternal impure waters, there is a hymn in Rigveda where sage Vishvamitra requests various rivers to stop and hear him. The names of rivers are significant. One is Shutudri, meaning which destroys fickleness, and the other is Vipaat, meaning one which destroys the narrowness of egoistic wisdom. The two rivers join each other, proceed towards a great union with Sindhu, where they can give birth to Indra.

First published : 19-3-2008 AD( Faalguna shukla trayodashee, Vikrama samvat 2064)

वेद में उदक का प्रतीकवाद

- सुकर्मपाल सिंह तोमर

(चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय मेरठ द्वारा १९९५ . में स्वीकृत शोधप्रबन्ध )

शाश्वत आपः

अब कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं यदि अष्टम काष्ठा के सिन्धु से अन्य सिन्धुओं द्वारा मधु का आदान करने के कारण उन्हें मर्यादाएं कहा जाता है तो उनकी सप्त काष्ठाओं में ऐसा कौन सा विष है जो मर्य जीवन को दुःख और नैराश्य से भरे रखता है ? और यदि सहज है तो मधु का अभाव क्यों अनुभव होता है ? अथवा आपः वा सिन्धव: की सृष्टि के लिए इन्द्र से बार - बार प्रार्थना क्यों की जाती है ?

          इन प्रश्नों के मूल में शाश्वत आपः और दिव्य आपः के भेद की अनदेखी करना है वेद में जिन आपः की सृष्टि के लिए प्रार्थना की जाती है वे दिव्य आपः हैं जो मनुष्य के लिए वरदान हैं इनके विपरीत शाश्वत आपः ( . .३२.२७) हैं जिनको इन्द्र की सहायता से ही पार किया जा सकता है ये आपः मनुष्य की उन बुद्धियों अथवा शक्तियों के प्रतीक हैं जो उसकी अहंबुद्धि मन और पांच अर्थों में सदैव रहती हैं इसमें कोई सन्देह नहीं कि इनका मूल भी वही अष्टम काष्ठा का महत् वा सिन्धु है जहां से दिव्य आपः आते हैं इस दृष्टि से आरम्भ में ये भी दिव्य होते हैं पर अहंबुद्धि में अनृत विकसित होता हुआ अहि वा दीर्घं तम: का रूप धारण कर लेता है तो उस अहि का विष उन आपः को विषाक्त करते करते उनकी सारी दिव्यता नष्ट कर देता है और ताजे दिव्य आपः को वहां नहीं आने देता इस प्रकार शाश्वत आपः दुःख के सागर का रूप धारण कर लेते हैं जिनसे पार पाने के लिए वृत्र वध दिव्य आपः के रुके प्रवाह को प्रवाहित करना और इससे भी अधिक इन्द्र जन्म या सूर्य/आत्मा के दर्शन आवश्यक है शाश्वत आपः जब अहिगोपा वा वृत्र की दास पत्नी बन जाती हैं तो उनको पार करने के लिए मनुष्य को किसी बाह्य पुल की प्राप्ति नहीं हो सकती अपितु इस निमित्त उसे अपने को ही स्वसेतु विप्र(. १०.६१.१९) बनना पडेगा इसका अभिप्राय है कि ये आपः हमारी ही दूषित चित्तवृत्तियां हैं जिनसे ऊपर उठने के लिए हमें स्वयं ही प्रयत्न करना पडेगा

विश्वामित्र का नदियों से संवाद

          इस प्रयत्न का एक चित्र विश्वामित्र - नदी संवाद ऋग्वेद .३३ में मिलता है संवाद में विश्वामित्र ऐसे व्यक्ति का प्रतीक है जो विश्वमैत्री का व्रती होने से भरतजनों की सहायता करने में दत्तचित्त है स्वयं ऐसे व्यक्ति की मानसिक चेतना द्विधा होती है प्रथम तो वह शु(चञ्चलता ) का तोदन करने से शुतुद्र संज्ञा ग्रहण करती है दूसरे अहंबुद्धि की संकीर्णताओं का विपादन करने से विपाट् संज्ञा ग्रहण करती है इन दोनों के युग्म को यहां विपाट् - शुतुद्री कहा गया है - - - - विश्वामित्र उनकी मनीषा को सिन्धु की ओर भेजना चाहता है तो लहरों से प्रवृद्ध होती हुई और एक दूसरे से संयुक्त होती हुई इन्द्रप्रसव की भिक्षा मांगती हुई वे पाशरहित(विपाश) उर्वी और मातृतमा सिन्धु तक पहुंच जाती हैं तो उसको ऐसे चाटने लगती हैं जैसे माताएं अपने वत्स को ( . .३३.-) पर वहां पहुंचकर जब विप्र विश्वामित्र अपने मन्तव्य के संकेतों को भरतजनों की चित्तवृत्तियों रूपी नदियों तक पहुंचाने में समर्थ होता है तो वे कहती हैं कि हम लोग तो पयः से प्रवृद्ध होती हुई देवनिर्मित योनि की ओर जा रही हैं पर यह विप्र क्या चाहता हुआ नदियों कहकर हमारे सर्गतक्त प्रसव को रोकने के लिए ( वर्तवे ) हमें संबोधित कर रहा है ? यह सुनकर विश्वामित्र उनसे क्षण भर सौम्य वचन सुनने हेतु रुकने के लिए कहता है और अपना मन्तव्य व्यक्त करते हुए बतलाता है कि हमारी जो बृहती मनीषा भरतजनों के कल्याण के लिए सिन्धु की ओर जा रही है उसमें मैं तुम्हारी सहायता का इच्छुक (अवस्य: ) हूं नदियों(भरतजन की चित्तवृत्तियों) को यह प्रस्ताव मान्य नहीं है उनका कहना है - इन्द्र ने नदियों के अवरोध को काटा वृत्र को मारा हमको बाहर निकाला और सविता देव हमें ले आया इस प्रकार हम उसके जन्म पर चौडी होकर जा रही हैं; इन्द्र ने जो अहि का वध किया उस वीरकर्म का हमें सदा(शश्वधा) खा करना है विश्वामित्र फिर भी आग्रह करता है कि वे उसके कहने को ठुकराएं नहीं उसका कहना है - हे बहिनों इस कवि की बात सुनो तुम बहुत दूर से गाडी वा रथ द्वारा चल कर आई हो इसके साथ ही वह भरतजनों से कहता है - आँखें नीची किए हुए सिन्धुजन(अधोअक्षाः सिन्धव: ) तुम अच्छी प्रकार नमस्कार करो और इन नदियों द्वारा( स्रोत्याभि: ) ही तुम अच्छी तरह पार हो जाओ( भवता सुपारा: ) इस पर नदियां विश्वामित्र की बात मान लेती हैं अर्थात् भरतजनों की चित्तवृत्तियां शान्त हो जाती हैं और गवेषणा परायण होकर भरतजन उनको पार कर लेते हैं विप्र को उन चित्तवृत्तियों की सुमति मिलती है और वह उनको आशीर्वाद देता है कि अब तुम सुराध को चाहती हुई खू बढो साथ ही वह कहता है कि हे शमनीय आपः तुम्हारी ऊर्मि ऊपर उठे तुम(वृत्र के) जुओं को उतार फेंको जिससे (भरतजन की ) दूषित हुई दोनों गाएं(अहंबुद्धि और चञ्चलबुद्धि) सुख - शान्ति को नष्ट करे

          इस संवाद में शश्वती आपः की सबसे बडी विशेषता सर्गतक्त प्रसव बताई गई है इसका उल्लेख दो बार हुआ है सर्ग का अर्थ है सृष्टि और तक्त का अर्थ है पीडा(कृच्छ| जीवन) को प्राप्त अतः सर्गतक्त प्रसव से अभिप्राय जीवन की उन उपलब्धियों से है जिन्हें सृष्टि में निहित स्वाभाविक दुःख कहा जा सकता है विश्वामित्र भरतजनों की चित्तवृत्तियों(शश्वती आपः ) से चाहता है कि वे इस पर रोक लगाने के लिए ( वर्तवे ) ठहरें पर वे नहीं ठहरती क्योंकि वे इसको अपना शाश्वत कर्त्तव्य मानती हैं इस पर विश्वामित्र का कहना है कि यदि भरतजन इन शश्वती आपः को पार कर जाएं तो इसका अर्थ होगा कि पूरा ग्राम(भरतजनों का समूह ) इन्द्र - प्रेरित गवेषक बन गया और तब सर्गतक्त प्रसव चले तो कोई आपत्ति नहीं क्योंकि तब नदियां (चित्तवृत्तियां) यज्ञिया हो जाएंगी और उनकी दुर्मति के स्थान पर सुमति मिल जाएगी -

यदङ्ग त्वा भरता: संतरेयुर् गव्यन् ग्राम इषित इन्द्रजूतः अर्षादह प्रसव: सर्गतक्त वो वृणे सुमतिं यज्ञियानाम् - . .३३.११

          जब तक यह सुमति नहीं आती तब तक उनकी अहंबुद्धि और मन पाप से दुष्कृत दो अघ्न्याओं(गायों) की तरह वृत्र(अक्ष) के जुए को अपने ऊपर लादे रहते हैं इस कारण इन शश्वती आपः की वह ऊर्मि नहीं उठ पाती जिसे सुमति कहा जा सकता है इसलिए इनको शम्या(शमनीय ) आपः कहा जाता है जिनके शान्त और स्थिर होने पर ही दीर्घं तम: से मुक्ति मिलती है और पाप से दूषित अहंबुद्धि और मन सुख - शान्ति को नष्ट नहीं कर पाते तभी इन आपः को पार करके सिन्धु(महत् अहं - पूर्व बुद्धि ) तक पहुंचा जा सकता है इसका उपाय इन शश्वती: आपः को दुत्कारना वा दबाना नहीं अपितु बहिन समझकर उनको नमस्कार करके अधोअक्षा होना (आंखें नीची करना ) है दूसरे शब्दों में दूषित चित्तवृत्तियों को दबाना या उनके लिए दु:खी होना कोई उपाय नहीं है अपितु उनका आत्मीयतापूर्वक उदात्तीकरण करने और ध्यानस्थ होने के अभ्यास से ही उन्हें पार करके मातृतमा उर्वी और विपाश सिन्धु तक पहुंचा जा सकता है और वहां से दिव्य आपः को लाया जा सकता है