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Wadhva on Fatah Singh

Introduction

Rigveda 6.47.15

Atharva 6.94

Aapah in Atharvaveda

Single - multiple waters

Polluted waters

Indu

Kabandha

Barhi

Trita

naukaa

nabha

Sindhu

Indra

Vapu

Sukham

Eem

Ahi

Vaama

Satya

Salila

Pavitra

Swah

Udaka

 

One vedic mantra calls Aditi, the undivided nature, as being present in 9 stages of consciousness, alongwith being the mother of 8 stages also. But she becomes the mother only at eighth level. Aditi of ninth level is unmanifested. Her expression at eighth level is called the first dawn. This first dawn, Ushaa, remains embedded in the lower 7 levels as Aditi of ninth level herself remains embedded into lower levels. Aditi of ninth level becomes pregnant at eighth level. This foetus at eighth levels is actually the first manifestation. This is called Sindhu. This sindhu is crossed by 7 sindhus and then 99 rivers are manifested. This sindhu is mother of mothers, while 7 sindhus are only mothers. Sindhu is the abode of 7 other sindhus. Further, the foetus of Sindhu is called bearing gold. This foetus takes birth as divine fire.

            There are three types of sindhus. One is having 8 forms, the other having 7 forms and the third is called all extending yaaga  manifestation.

            Sindhu is superior than all other waters which are 21 in number. These waters come to Sindhu as mothers come to their children. This means that Sindhu symbolizing super mind is the source of energy for waters at 3 grosser levels. At the same time, Sindhu receives back these waters. If this back flow of 21 waters to Sindhu is hindered, then these 21 waters may not be able to get rejuvenation.

            The nature of Sindhu is such that it has the combined character of both male and female. It is not possible to differentiate between the two. Then at lower levels, this integrity is divided.  It will be interesting to know why Sarasvati is called the mother of Sindhu or 7 sindhus. The first manifestation, as has been stated above, is called Dawn/Usha. These dawns are the mothers of sindhus.

 Puraanic view of Sindhu1  Puraanic view of Sindhu2

First published on internet : 14-3-2008 AD( Faalguna shukla ashtamee, Vikrama samvat 2064)

वेद में उदक का प्रतीकवाद

- सुकर्मपाल सिंह तोमर

(चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय, मेरठ द्वारा १९९५ ई. में स्वीकृत शोध प्रबन्ध )

सिन्धु

अदिति(जिसका अर्थ है अखण्ड) को नवगज्जनित्री नाम दिया गया है(वधूर्जिगाय नवगज्जनित्री - अथर्व ८.९.११) । नवगज्जनित्री का अर्थ यह हो सकता है कि वह नौ काष्ठाओं में विद्यमान होती हुई अष्ट काष्ठाओं की जननी भी है । पर वह जननी बनती है अष्टम काष्ठा में, क्योंकि प्रथम पीयूष और इन्द्रपान कही जाने वाली आपः की प्रथम ऊर्मि(सोम) आदि का जन्म भी वहीं होता है । अतः नवगज्जनित्री अदिति केवली वह अव्यक्त तत्त्व है जिसे अजन्मा परा काष्ठा(पुरुष) में अन्तर्निहित माना गया है । इसलिए अष्टविध सृष्टि की जनित्री होती हुई भी, वह अजन्मा काष्ठा सहित नव काष्ठाओं में विद्यमान मानी गई है । अष्टम काष्ठा में होने वाली इसकी अभिव्यक्ति को प्रथम उषा या एकाष्टका कहा गया है(अयमेव सा प्रथमा व्यौच्छद् - अथर्व ८.९.११) जो अपने से नीची सात काष्ठाओं में उसी प्रकार प्रविष्ट मानी गई है जिस प्रकार नवगज्जनित्री । इस प्रकार प्रत्येक काष्ठा अपने से नीचे अन्य सभी काष्ठाओं में प्रविष्ट है ।

सिन्धु और सप्त आपः

          सप्त तन्तुओं वा सप्त सिन्धुओं(आपः) के स्तर की जो जीवकेन्द्रित नानात्वमयी सृष्टि प्रतीत होती है, वह अष्टम काष्ठा के बिना नहीं सोची जा सकती । नवगज्जनित्री कही जाने वाली स्वयंभू अदिति सर्वप्रथम अष्टम काष्ठा में ही गर्भ धारण करती है । अतः यह अष्टम काष्ठा का गर्भ ही वस्तुतः आद्या सृष्टि है । इसी का नाम सिन्धु है जिसे सप्त सिन्धव:(आपः) द्वारा पार करके इन्द्र (महान् आत्मा ) निन्यानबे नदियों की सृष्टि तक पहुंचता है  और मनुष्यों व देवों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है (नवतिं स्रोत्या नव च स्रवन्तीर्देवेभ्यो गातुं मनुषे च विन्दः -  ऋग्वेद १०.१०४.८)। सिन्धु को लेकर इन नदियों की संख्या सौ होती है जिनकी तुलना सौ देवकर्मों के यज्ञ से की जा सकती है । इस प्रकार सिन्धुओं को शतरूपा सर्वताति यज्ञ के रूप में प्रकट होने वाली भी माना जा सकता है । यह सिन्धु मातृतमा है(अच्छा सिन्धुं मातृतमामयासं - ऋ. ३.३३.३) है, जबकि सप्त सिन्धव: वा सप्त आपः केवल माताएं हैं ( ऋग्वेद ६.४५.२४-२५, ८.२९.४, देवीरापो मातरः सूदयित्न्वो - १०.६४.९) । सिन्धु वह समान योग है जहां सप्त आपः का रथ अन्ततोगत्वा पहुंचता है ( ऋ. ७.६७.८) । सिन्धु हिरण्यवर्तनि है(सिन्धुर्हिरण्यवर्तनिः - ऋ. ८.२६.१८) और उसका गर्भ( महान् आत्मा ) हिरण्यगर्भ कहलाता है । इसी गर्भ को लेती हुई सप्त आपः सिन्धु से बाहर आती हैं और अग्नि को सब देवों के असु रूप में वा देवाधिदेव यज्ञ रूप में जन्म देती हैं । अतः सप्त आपः एक बार तो सिन्धु रूप में और दूसरी बार सप्त सिन्धुओं के रूप में जन्मती हैं । अतः आपः को द्विजा, दो बार जन्म लेने वाली ( द्विजा अह प्रथमजा ऋतस्य - ऋ. १०.६१.१९) और प्रथमजा(प्रथम बार जन्म लेने वाली ) दोनों ही विशेषण दिए जाते हैं । प्रथमजा कहने पर आठ काष्ठाओं की आपः (अष्ट जाता: प्रथमजा: ऋतस्य - अथर्व ८.९.२१) का बोध होता है तो द्विजा कहने से केवल नीचे की सप्त काष्ठाओं के आपः का । इस प्रकार अष्टपुत्रा और सप्तपुत्रा अदिति के समान सिन्धु भी अष्टरूपा और सप्तरूपा दोनों ही कही जा सकती है और तीसरा उसका रूप सर्वताति यज्ञसृष्टि का रूप है ।

          इस सिन्धु के तीनों रूपों का वर्णन विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से वेदों में प्राप्त है । केवल अष्टम काष्ठा की दृष्टि से वह दैव्य अष्टम विश्व है (मनुष्वद्दैव्यमष्टमं पोता विश्वं तदिन्वति ॥ - ऋ. २.५.२) जिसमें स्थित महान् अष्टम शूर( कमृत्विजामष्टमं शूरमाहुः - ऋग्वेद १०.११४.९), चेतनपिता और यज्ञसृष्टि का नेता कहा जाता है (नेता सिन्धूनां वृषभ स्तियानाम् । - ऋ. ७.५.१-२) । सप्त सिन्धुओं का उद्गम होने से इसे सप्तबुध्न अर्णव( सप्त आपः का बुध्न/पैंदा) कहते हैं( या सप्तबुध्नमर्णवं जिह्मबारमपोर्णुत - ऋ. ८.४०.५) । यह अर्णव सप्त सिन्धुओं के रूप में मर्त्य स्तर की सृष्टि में पहुंचता है और सर्वताति का रूप ग्रहण करता है । इन्हीं तीनों रूपों के संदर्भ में आत्मा को सूक्ष्म और स्थूल काष्ठाओं के भेद से दो रूपों में चित्रित किया गया है । सिन्धु और सप्त सिन्धुओं की सृष्टि में भी प्रथम के साथ वह मनुपिता और प्रमति( इडा वा महत्) के मिथुनत्व का युञ्ज रूप यज्ञ(यज्ञो मनुः प्रमतिर्नः पिता हि कमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे - ऋ. १०.१००.५) है, जबकि दूसरे स्तर पर वह समिद्ध मनुष् है, देवों का यजन करने वाला जातवेदा: है(समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान्यजसि जातवेदः - ऋ. १०.११०.१), तो तीसरे स्तर पर वह अनेक मानुषों के रूप में माना जाता है । द्वितीय और तृतीय स्तर पर सृष्टि को क्रमशः ऋषियों और मानुषों का यज्ञ कहा जाता है(ऋषीणां च स्तुतीरुप यज्ञं च मानुषाणाम् - ऋ. १.८४.२), जिनमें सप्त सूक्ष्म काष्ठाओं के संदर्भ में कल्पित सप्त मानुष नामक अग्नि सभी सिन्धुओं में स्थित कहा जाता है (यो अग्निः सप्तमानुषः श्रितो विश्वेषु सिन्धुषु - ऋ. ८.३९.८) ।

          विश्वेषु सिन्धुषु के संदर्भ में, सिन्धु का एक सुन्दर चित्र ऋग्वेद १०.७५ में उपलब्ध है । यहां सिन्धु को अन्य सिन्धुओं(आपः ) की उत्तम महिमा कहा गया है , क्योंकि वह अपने ओज द्वारा उन सब आपः से श्रेष्ठ है जो सात सात के तीन वर्गों में(सप्त सप्त त्रेधा) गतिशील(प्र सप्तसप्त त्रेधा हि चक्रमुः प्र सृत्वरीणामति सिन्धुरोजसा १०.७५.१) हैं । अन्य आपः वस्तुतः वे मार्ग हैं जो वरुण ने सिन्धु के लिए अपने बलों(वाजान्) को दौडाने के लिए   बनाए हैं(प्र तेऽरदद्वरुणो यातवे पथः सिन्धो यद्वाजाँ अभ्यद्रवस्त्वम् १०.७५.२) । सिन्धु वृषभ है जो इन मार्गों पर चलते समय अनन्त बल, शब्द और वृष्टि करता हुआ   चलता है(अभ्रादिव प्र स्तनयन्ति वृष्टयः सिन्धुर्यदेति वृषभो न रोरुवत्  १०.७५.३) । पर यह गमन केवल एक तरफा नहीं है, क्योंकि सभी आपः भी सिन्धु के पास ऐसे आते हैं जैसे माताएं वा गायें अपने शिशु के पास   आती हैं(अभि त्वा सिन्धो शिशुमिन्न मातरो वाश्रा अर्षन्ति पयसेव धेनवः १०.७५.४) । इसका अभिप्राय आध्यात्मिक दृष्टि से यही है कि मनुष्य व्यक्तित्व की उपर्युक्त अष्ट काष्ठाओं में से अतिमानसिक सिन्धु मनोमय, प्राणमय और अन्नमय स्तरों की सप्त सप्त त्रेधा आपः की शक्ति का स्रोत भी है और उनके प्रवाहों का पुनर्ग्रहीता भी । इन इक्कीस शक्ति प्रवाहों का स्वास्थ्य, नवीनीकरण के अभाव में संकटापन्न हो जाए यदि वे पुनः अतिमानसिक सिन्धु में पहुंचकर दीर्घं तम: ( वृत्र) से उत्पन्न दुरित को दूर न कर लें ।

 सिन्धुमाता सरस्वती

सिन्धु काष्ठा का एक युञ्ज है जिसमें नवगज्जनित्री विराट् गाय के दोनों वत्स( बछडा और बछिया) परस्पर संयुक्त हैं ( ब्रह्मैनद् विद्यात् तपसा विपश्चिद् यस्मिन्नेकं युज्यते यस्मिन्नेकम् - अथर्व ८.९.३) । अतः वृषभ का युञ्ज होने से यदि उसे पुल्लिंग वृषभ कहा जा सकता है तो धेनु का युञ्ज होने से उसे स्त्रीलिंग (स्वश्वा सिन्धुः सुरथा सुवासा हिरण्ययी सुकृता वाजिनीवती । ऊर्णावती युवतिः सीलमावति.. - ऋ. १०.७५.८) भी कहा जा सकता है । एक दूसरी कल्पना के अनुसार इस काष्ठा का युञ्ज वस्तुतः इन्द्र के दोनों अश्वों का युञ्ज है (हरी ते युञ्जा पृषती अभूताम् - ऋ. १.१६२.२१) जिनमें से एक पुल्लिंग तो दूसरा स्त्रीलिंग है । अतः सिन्धु युवती को घोडी के समान दर्शनीय भी कहा जाता है (अदब्धा सिन्धुरपसामपस्तमाश्वा न चित्रा वपुषीव दर्शता - ऋ. १०.७५.७) । दूसरे शब्दों में, सिन्धु नामक अतिमानसिक काष्ठा में इड और इडा, वृषभ और धेनु, महान् आत्मा और महत् दोनों की संयुक्त इकाई है ।

          यह संयुक्त इकाई जब सप्त सिन्धुओं के माध्यम से सभी सिन्धुओं में परिणत होकर सर्वताति सृष्टि का रूप ग्रहण करती है, तब यह अश्व और अश्वा, दोनों से युक्त , अश्विन् रथ द्वारा अपने वाज को अनेकशः विभक्त करती है ( ऋ. १०.७५.९) । दूसरे शब्दों में, अब इकाई द्वैत ग्रहण करके अनेकता में परिणत होती है । इसी का अर्थ है वृषभ इन्द्र के दो अश्वों द्वारा यज्ञसृष्टि में ले जाया जाना, अथवा सिन्धु का सप्तविध होकर वा मनुष का सप्तमानुष होकर सभी सिन्धुओं में पहुंचना, अथवा सिन्धु माता का सप्तथी सरस्वती होना (आ यत्साकं यशसो वावशानाः सरस्वती सप्तथी सिन्धुमाता - ऋ. ७.३६.६) और सभी कामना करने वाली और दुधारू सुन्दर धाराओं(आपः) का एक साथ पहुंचना । इस प्रकार, जो सिन्धु - माता सरस्वती प्रथमा काष्ठा में एक आयसी पू: के रूप में स्थिर थी, वह प्रवाहित हो पडती है और अन्य सब आपः को अपनी महिमा से अभिभूत कर लेती है -

प्र क्षोदसा धायसा सस्र एषा सरस्वती धरुणमायसी पू: । प्र बाबधाना रथ्येव याति विश्वा अपो महिना सिन्धुरन्या: ।। - ऋ. ७.९५.१

          इस प्रकार, यह सरस्वती समुद्र(प्रथमा काष्ठा) से आने वाली, अनेक गिरियों(काष्ठाओं) के निमित्त जाने वाली और सभी नदियों(आपः) की एक इकाई(एका नदीनाम् ) बन जाती है (एकाचेतत्सरस्वती नदीनां शुचिर्यती गिरिभ्य आ समुद्रात् - ऋग्वेद ७.९५.२) जिससे वह महान् सिन्धु( महो अर्ण: ) सरस्वती अन्य काष्ठाओं की बुद्धियों को विविध रूप में प्रकाशित करने वाली, सुमतियों को प्रबुद्ध करने वाली और यज्ञसृष्टि को धारण करने वाली कही जाती है (चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम् । यज्ञं दधे सरस्वती ॥ऋ. १.३.११, महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना ।
धियो विश्वा वि राजति ॥१.३.१२) ।

 ऋत के दो द्वार और वृत्रघ्नी सिन्धुमाता

          सुमति को प्रबुद्ध करने की आवश्यकता दुर्मतियों के प्रकोप के कारण पडती है । पर इन द्विविध मतियों के उद्गम स्थान ऋत के परस्पर विरोधी द्वार हैं । इनके नाम ऋत और अनृत हैं । इनको अन्यत्र द्युलोक के क्रमशः अवृक् और सवृक् द्वार कहा गया है । वृक का अर्थ भेडिया होता है और वृक वेद में वृत्र का प्रतीक है । अतः उषा से प्रार्थना की जाती है कि वह हमें अवृक द्वार प्रदान करे  (प्र नो यच्छतादवृकं पृथु च्छर्दिः - ऋग्वेद १.४८.१५) । वृक एक अघ  है । अतः उस पथ को छोडना है (यो नः पूषन्नघो वृको दुःशेव आदिदेशति । अप स्म तं पथो जहि ॥ - ऋग्वेद १.४२.२) । अग्नि से उसको दूर करने की प्रार्थना है(स नः सिन्धुमिव नावयाति पर्षा स्वस्तये ।
अप नः शोशुचदघम् ॥ - ऋ. १.९७.१-८), क्योंकि इसके नष्ट होने पर ही भद्र ( ऋ. २.४१.११) संभव है । यह अघ एक दु:शंस और मर्त्य रिपु है । यह द्वैत का प्रेमी( द्वयू) है (समित्तमघमश्नवद्दुःशंसं मर्त्यं रिपुम् । यो अस्मत्रा दुर्हणावाँ उप द्वयुः ॥ - ऋ. ८.१८.१४)। अतः हमारे हृदयों में विद्यमान देवों को यह जानने की आवश्यकता है कि द्वैतप्रेमी (द्वयू) कौन है और अद्वैतप्रेमी(अद्वयू) कौन सा है (पाकत्रा स्थन देवा हृत्सु जानीथ मर्त्यम् । उप द्वयुं चाद्वयुं च वसवः ॥ ऋ. ८.१८.१५) । इस अघ रूपी वृत्र का विनाश तभी संभव है जब प्रथमा काष्ठा सिन्धु अथवा प्रथमा उषा के उदय से सूर्यरश्मियों से प्रवाहित होने वाली उषाएं ज्योति को भरती हुई प्रकट हों( ऋ. १०.३५.४-५) । ये ही उषाएं सिन्धु माताएं हैं । इनसे सूर्य, उषा और सोम के साथ अभद्र अघ का नाश करके भद्र करने की प्रार्थना की गई है (मातॄन्सिन्धून्पर्वताञ्छर्यणावतः  - ऋ. १०.३५.२-३) । इस प्रसंग में वेद यह स्पष्ट करना नहीं भूलता कि जिस प्रथमा उषा अथवा सिन्धु से अन्य उषाएं अथवा सिन्धव: अघनाशन में समर्थ होती हैं, वह वही बुद्धि(धिषणा) है जिसे सविता का श्रेष्ठ वरेण्य भाग और स्वस्ति अग्नि कहा जाता है (श्रेष्ठं नो अद्य सवितर्वरेण्यं भागमा सुव स हि रत्नधा असि  -  ऋ. १०.३५.७) और जो प्रसिद्ध गायत्री ऋक् का वरेण्यं भर्ग है(तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि - ऋ. ३.६२.१०) । इसी दृष्टि से सिन्धुमाता सरस्वती वृत्रघ्नी है (उत स्या नः सरस्वती घोरा हिरण्यवर्तनिः - ऋ. ६.६१.७) और उसकी सहायक सप्त सिन्धव: के संदर्भ से उसे सप्तस्वसा कहा जाता है (उत नः प्रिया प्रियासु सप्तस्वसा सुजुष्टा । सरस्वती स्तोम्या भूत् ॥- ऋ. ६.६१.१०) । सभी काष्ठाओं की रक्षा करने वाली यही पहली काष्ठा है । इसलिए सरस्वती बुद्धियों की रक्षिका(धीनामवित्री - ऋ. ६.६१.४) कहलाती है और बुद्धियों ( ऋ. ७.३५.११) के अथवा अपने रूपान्तरों सारस्वतों के साथ सरस्वती सारस्वतेभि: (सरस्वती सारस्वतेभिरर्वाक्तिस्रो देवीर्बर्हिरेदं सदन्तु - ऋ. ७.२.८) याद की जाती है । ये सारस्वत और सिन्धुमाता सरस्वती के सिन्धव: एक ही हैं । अतः 'सरस्वती सिन्धुभि:'  (इन्द्रो नेदिष्ठमवसागमिष्ठः सरस्वती सिन्धुभिः पिन्वमाना - ऋ. ६.५२.६) कथन वही अर्थ रखता है ।

 

सिन्धु की त्रिविध बुद्धि

यद्यपि इस प्रकार सिन्धुमाता सरस्वती के वर्णन से बुद्धि के सरस्वती पक्ष को अधिक महत्त्व मिल गया है, पर वस्तुतः सिन्धु के सरस्वती, इडा और भारती नाम से तीन पक्ष हैं । इन्हीं को 'तिस्रो देवी:' ( ऋ. ३.४.८) भी कहा जाता है । जैसा कि पहले कहा जा चुका है, सिन्धु का सलिल एक युञ्ज है जिसमें महान् आत्मा और उसकी महद् बुद्धि एक संयुक्त इकाई के रूप में हैं । अतः इस इकाई को बुद्धि(धिषणा) और स्वस्ति अग्नि भी कहा जाता है और अग्नि को, इसी आधार पर, अदिति, भारती, इडा तथा सरस्वती के रूप में भी स्मरण किया जाता है -

त्वमग्ने अदितिर्देव दाशुषे त्वं होत्रा भारती वर्धसे गिरा । त्वमिळा शतहिमासि दक्षसे त्वं वृत्रहा वसुपते सरस्वती ।। - ऋ. २.१.११

          अदिति अखण्ड और अव्याकृत रूप है । वह सरस्वती, इडा और भारती नाम से तीनों पक्षों में व्याकृत होती है । अदिति(महत्) को अरस्तु की शुद्ध बुद्धि और इस्लामी परम्परा की अल - अक्ल कह सकते हैं । मानव जीवन में यही बुद्धि क्रिया, ज्ञान और भावना की शक्तियों में प्रकट होती है । जैसा कि आगे के विवेचन से स्पष्ट होगा, ये ही तीनों शक्तियां वेद में क्रमशः सरस्वती, इडा और भारती नाम से जानी गई हैं । यद्यपि निम्न स्तर पर ये तीनों अलग - अलग देखी जा सकती हैं, पर अष्टम काष्ठा(सिन्धु) के स्तर पर वे उससे अभिन्न, उसके ही तीन पक्ष हैं जिन्हें द्वार: कहा जाता है ।

           ये द्वार: (बहुवचन) हैं जो अपनी महद् बुद्धियों(महद्भि: ) द्वारा देव - रथ( जायमान महान् आत्मा) को धारण करती हैं ( ऋ. १०.७०.५) अथवा द्वारो देवी: हैं जो अलंकृत स्त्रियों के समान अपने पतियों(आत्मा की विविध विभूतियों) के निमित्त विविध रूप ग्रहण करती हैं (ऋग्वेद १०.११०.५, ५.५.५) , अथवा द्वार: हैं जिन्हें इन्द्र ने अनन्त अश्म में छिपी निधि को बाहर निकालने के लिए खोला( ऋ. १.१३०.३) । द्वार: देवी: के लिए प्रायः उर्विया, सुप्रायणा वा अजुर्या विशेषणों तथा विश्रयन्ताम् क्रिया का प्रयोग होता है ( ऋ. १.१३.६, २.३.५, १.१४३.६) और वे देवों के लिए फैलाने वाली वा विविध रूप धारण करने वाली हैं (ऋ. २.३.५), यद्यपि वे मूलरूप में पवमान सोम से सुष्टुत और हिरण्यय हैं ( ऋ. ९.५.५) । विविध रूप ग्रहण करने का अभिप्राय है अष्टम काष्ठा के हिरण्यय रूप को छोडकर नीचे की काष्ठाओं की नानात्वमयी यज्ञसृष्टि में परिणत होना । इसी बात को स्पष्ट करते हुए, सुन्दर रूप वाली तीन देवियों(सरस्वती, इडा और भारती) को पवमान की मही कहा गया है और उन्हें हमारे यज्ञ में आने के लिए आहूत किया गया है -

भारती पवमानस्य सरस्वतीळा मही । इमं नो यज्ञमा गमन् तिस्रो देवी: सुपेशस: ।। - ऋ. ९.५.८

          तीन द्वारों वा देवियों के रूप में कल्पित महद् बुद्धि के तीनों पक्षों के पृथक् - पृथक् स्वरूप की ओर भी संकेत मिलता है । इस दृष्टि से सरस्वती का सम्बन्ध कर्मवाचक अपस् ( ऋ. १०.११०.८) से विशेष महत्त्व रखता है । वह अपसामपस्तमा ( ऋ. ६.६१.१३) अर्थात् कर्मों में सर्वाधिक क्रियाशील कही जाती है । अतः वह महद् बुद्धि के क्रियापक्ष की द्योतक प्रतीत होती है । भारती का विशेषण विश्वतूर्ति ( ऋ. २.३.८) भावनात्मक त्वरण का सूचक है । अतः भारती को महत् के भावना पक्ष का प्रतीक माना गया प्रतीत होता है । भारती को वरूत्री ( आवरण करने वाली ) बुद्धि ( ऋ. १.२२.१०) कहना भावना के सम्मोहक पक्ष की ओर ही संकेत करता है । भावना निस्सन्देह मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को ओतप्रोत करके क्षणभर में उसके क्रिया और ज्ञान को प्रभावित कर देती है । सरस्वती और भारती से भिन्न स्वरूप इडा का है । इडा और इड का विशेष सम्बन्ध संज्ञान(ऋ. १०.१९१.१-२) अर्थात् ज्ञानशक्ति से है । ज्ञान शक्ति को प्रायः अग्नि - रूप में कल्पित किया जाता है । तदनुसार इडा भी समिद्ध होती है और अग्नि के सुदीप्त वरेण्य रूप को धारण करती है । इडा को जब मनुषस्य शासनी(ऋ. १.३१.११) कहा जाता है तो भी इसका अभिप्राय यही है कि मनुष्य के ऊपर क्रिया अथवा भावना की अपेक्षा ज्ञानशक्ति का ही शासन होना चाहिए और होता है ।

          फिर भी, व्यावहारिक दृष्टि से देखने पर, भावना और ज्ञान, दोनों में क्रिया का समावेश मिलेगा । अष्टम काष्ठा का महान् आत्मा जब अन्य काष्ठाओं के नानात्व में व्यक्त होता है तो वह सब देवों में सर्वाधिक क्रियाशील(अपसामपस्तम: (अयं देवानामपसामपस्तमो - ऋ. १.१६०.४) उसी प्रकार कहा जाता है जिस प्रकार महद् बुद्धि की प्रतीक सिन्धु के लिए अपसामपस्तमा(अदब्धा सिन्धुरपसामपस्तमा - ऋ. १०.७५.७) विशेषण का प्रयोग होता है । सामान्य भाषा में भी, भावना करने और जानने को क्रिया के अन्तर्गत ही रखते हैं । इसका अर्थ यह है कि भावना और ज्ञान दोनों ही क्रियामूलक हैं । कम से कम निचली सप्त काष्ठाओं के स्तर पर तो यह स्पष्ट ही है । हां, नवम काष्ठा की बात दूसरी है, जहां नवगज्जनित्री अखण्ड बुद्धि( अदिति) स्थिर हो जाने से सभी यज्ञकर्म रुक जाते हैं । जब अष्टम काष्ठा में उसका व्रतप्रसव आत्मा(यज्ञ) को सक्रिय करता है, तब से तो क्रिया और तन्मूलक भावना और ज्ञान का आरम्भ मानना ही पडेगा । अतः अष्टम काष्ठा(सिन्धु) में महद् बुद्धि के तीनों पक्षों का उद्रेक स्वीकार करना होगा । पर वह अनेकत्व नहीं, एकत्व होगा । इसीलिए इन तीनों को उससे अभिन्न, द्वार: माना गया है । जैसे एक घर में तीन द्वार होने पर भी घर एक ही रहता है, वैसे ही भावना - ज्ञान - क्रिया का उद्भव होने पर भी अष्टम काष्ठा एक ही रहती है ।

          हमने देखा कि महत् तत्त्व किस प्रकार सिन्धु सरस्वती होकर हमारी सभी चेतना - धाराओं को बीज रूप में धारण किए हुए तिस्रो देवी: नामक इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति की त्रिविधता को प्राप्त करके हमारी समस्त चित्तवृत्तियों, संकल्पों - विकल्पों और क्रियाओं के रूप में नानात्व ग्रहण करती है । यही सरस्वती नामक मूल चेतना धारा अहंकार रूप वृत्र का वध करने के कारण वृत्रघ्नी बनी और इसी ने सप्तविधा आपो देवी: को त्रिविधता प्रदान करके हमारे व्यक्तित्व के कण - कण में पहुंचाया, जिसके परिणामस्वरूप हमारे अन्धकार - लिप्त जीवात्मा को नई स्फूर्ति, नया जीवन और नया जन्म प्राप्त हुआ ।